मानसून सत्र में पास होगा ट्रिब्यूनल सुधार विधेयक? सुप्रीम कोर्ट के कड़े रुख के बाद केंद्र सरकार की बड़ी तैयारी, जानिए ट्रिब्यूनलों में क्या-क्या बदल जाएगा

देशभर के विभिन्न ट्रिब्यूनलों (अधिकरणों) में खाली पड़े पदों, सर्च-कम-सिलेक्शन कमेटियों की स्वायत्तता और उनके कामकाज को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा समय-समय पर दिए गए कड़े निर्देशों और फैसलों के बाद केंद्र सरकार अब बैकफुट पर दिख रही है। सूत्रों के मुताबिक, मोदी सरकार आगामी संसद के मानसून सत्र में एक नया और व्यापक 'ट्रिब्यूनल सुधार विधेयक' (Tribunal Reforms Bill) पेश करने की पुरजोर तैयारी कर रही है। इस नए विधेयक का मुख्य उद्देश्य देश के न्यायिक और अर्द्ध-न्यायिक ट्रिब्यूनलों में लंबे समय से लंबित पड़े मुकदमों का तुरंत निपटारा करना, नियुक्तियों में पारदर्शिता लाना और न्यायपालिका के निर्देशों के अनुरूप सुधारों को अमलीजामा पहनाना है।
अध्यक्ष और सदस्यों के कार्यकाल तथा 50 वर्ष की न्यूनतम आयु सीमा में संशोधन की संभावना
प्रस्तावित कानून में सबसे बड़ा बदलाव ट्रिब्यूनल अध्यक्षों (Chairpersons) और सदस्यों (Members) की नियुक्ति और उनके सेवा काल से जुड़ा हो सकता है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने 4 साल के छोटे कार्यकाल और 50 वर्ष की न्यूनतम आयु सीमा वाले प्रावधानों को खारिज करते हुए कहा था कि इससे वरिष्ठ और योग्य अधिवक्ताओं तथा न्यायाधीशों का झुकाव ट्रिब्यूनल की तरफ नहीं हो पाता। नए ड्राफ्ट में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों का सम्मान करते हुए अध्यक्षों और सदस्यों के कार्यकाल को बढ़ाकर 5 साल करने और आयु सीमा के नियमों को लचीला बनाने की सिफारिशों को शामिल किए जाने की पूरी संभावना है, ताकि ट्रिब्यूनलों को ज्यादा स्थायित्व मिल सके।
नेशनल ट्रिब्यूनल कमीशन (NTC) का हो सकता है गठन, नियुक्तियों में बढ़ेगी स्वायत्तता
विधेयक का एक और सबसे महत्वपूर्ण और क्रांतिकारी पहलू 'नेशनल ट्रिब्यूनल कमीशन' (National Tribunal Commission – NTC) के गठन से जुड़ा हो सकता है। न्यायपालिका लंबे समय से यह मांग करती आ रही है कि देशभर के सभी ट्रिब्यूनलों का प्रशासनिक नियंत्रण, उनकी नियुक्तियां, बुनियादी ढांचा और फंड का प्रबंधन संबंधित मंत्रालयों के बजाय एक स्वतंत्र निकाय (NTC) के पास होना चाहिए। इससे ट्रिब्यूनलों की कार्यप्रणाली में कार्यपालिका (सरकार) का दखल खत्म होगा और उनकी न्यायिक स्वायत्तता सुनिश्चित होगी। इसके अलावा सर्च-कम-सिलेक्शन कमेटियों में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) या उनके द्वारा नामित सुप्रीम कोर्ट के जज की भूमिका को सर्वोपरि और निर्णायक बनाया जा रहा है।
लंबित मुकदमों के तेजी से निपटारे और खाली पदों को भरने का रास्ता होगा साफ
वर्तमान में देश के विभिन्न ट्रिब्यूनलों—जैसे नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT), कैट (CAT), टीडीसैट (TDSAT) और एनसीएलएटी (NCLAT)—में बड़ी संख्या में पद खाली पड़े हैं, जिसके कारण आम नागरिकों और उद्योग जगत के हजारों मामले लटके हुए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने हाल की सुनवाई में स्पष्ट चेतावनी दी थी कि अगर सरकार समय रहते ट्रिब्यूनलों को सशक्त नहीं बनाती है, तो इससे पूरी न्यायिक व्यवस्था चरमरा जाएगी। उम्मीद जताई जा रही है कि संसद से यह नया विधेयक पास होने के बाद ट्रिब्यूनलों की कमियों को दूर किया जा सकेगा और देश में त्वरित न्याय व्यवस्था का एक नया दौर शुरू होगा।