विश्व पर्यावरण दिवस विशेष: सबसे बड़ा प्रदूषक चीन आखिर क्यों बन गया दुनिया का सबसे बड़ा पेड़ लगाने वाला देश?

यह बात सुनने में थोड़ी अजीब लग सकती है कि जो देश पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा प्रदूषण फैलाने के लिए बदनाम है, वही देश पिछले कुछ दशकों से पागलों की तरह पेड़ लगाने में जुटा हुआ है। हम बात कर रहे हैं चीन की। आज चीन को दुनिया का सबसे बड़ा कार्बन उत्सर्जक (Carbon Emitter) माना जाता है, यानी कुल मात्रा में सबसे ज्यादा कार्बन डाइऑक्साइड वही हवा में छोड़ता है। लेकिन इस कड़वे सच का एक दूसरा और बेहद सकारात्मक पहलू भी है। चीन बड़े पैमाने पर रेगिस्तान को रोकने, मिट्टी को बचाने और अपनी हवा को सुधारने के लिए दुनिया का सबसे बड़ा वृक्षारोपण अभियान चला रहा है।
आज 'विश्व पर्यावरण दिवस' (5 जून) के मौके पर आइए इस पहेली को थोड़ा गहराई से समझते हैं कि आखिर दुनिया को प्रदूषण के दलदल में धकेलने वाला यह देश खुद को हरा-भरा बनाने के लिए इतना बड़ा निवेश क्यों कर रहा है।
कैसे बना चीन दुनिया का सबसे बड़ा प्रदूषक?
अगर हम आंकड़ों पर नजर डालें, तो साल 2006 के आसपास चीन ने कुल कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन के मामले में अमेरिका को भी पीछे छोड़ दिया था। इसके बाद वह दुनिया का सबसे बड़ा वार्षिक कार्बन उत्सर्जक बन गया। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीन को सबसे बड़ा प्रदूषक मुख्य रूप से उसके कुल कॉर्बन डाइऑक्साइड (CO2) उत्सर्जन के आधार पर ही कहा जाता है।
चीन के इस हाल के पीछे उसकी कई दशकों की वो नीतियां थीं, जिनके तहत उसने 'दुनिया का कारखाना' (World's Factory) बनने का रास्ता चुना। सस्ते लेबर, विशाल कारखाने और अंधाधुंध एक्सपोर्ट ने चीन को एक आर्थिक महाशक्ति तो बना दिया, लेकिन वहां के पर्यावरण को पूरी तरह तबाह कर दिया। इसके पीछे मुख्य रूप से 4 बड़ी वजहें रहीं:
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कोयले पर अत्यधिक निर्भरता: चीन ने अपनी फैक्ट्रियों को चौबीसों घंटे चलाने के लिए सबसे ज्यादा सस्ते और गंदे ईंधन यानी कोयले पर भरोसा किया।
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तेज औद्योगीकरण: स्टील, सीमेंट, केमिकल और कंस्ट्रक्शन जैसे भारी उद्योगों का जाल बहुत तेजी से फैला, जिनसे भारी मात्रा में जहरीला धुआं निकलता है।
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शहरीकरण की बाढ़: करोड़ों लोग गांवों से निकलकर शहरों में बस गए, जिससे नई सड़कों, गाड़ियों और बिजली की मांग कई गुना बढ़ गई।
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दुनिया की जरूरतें पूरी करना: चीन जो भी प्रदूषण फैला रहा है, उसका एक बड़ा हिस्सा उन सामानों को बनाने से जुड़ा है जिनका इस्तेमाल भारत, अमेरिका और यूरोप जैसे दूसरे देश करते हैं।
फिर अचानक सबसे ज्यादा पेड़ क्यों लगाने लगा चीन?
पर्यावरण की इस भारी तबाही के बाद चीन को समझ आया कि अगर प्रकृति को नहीं बचाया गया, तो यह आर्थिक तरक्की बहुत दिन टिकने वाली नहीं है। चीन ने साल 1978 में एक संगठित राष्ट्रीय अभियान शुरू किया, जिसके तहत अब तक 66 अरब से ज्यादा पेड़ लगाए जा चुके हैं। इसकी वजह से करीब 3.2 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में नई हरियाली लौट आई है।
चीन ने अपने इस अभियान के पीछे कुछ बेहद ठोस कूटनीतिक और भौगोलिक कारण रखे हैं:
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रेगिस्तान के फैलाव को रोकना: चीन के उत्तर और पश्चिमी इलाकों में गोबी रेगिस्तान का फैलाव एक बहुत बड़ा संकट रहा है। वहां से उठने वाले धूल के बवंडर राजधानी बीजिंग तक पहुँचकर जनजीवन ठप कर देते थे। इसे रोकने के लिए चीन ने पेड़ों की एक विशाल दीवार खड़ी करने का फैसला किया।
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खेती और मिट्टी को बचाना: जंगलों के कटने से मिट्टी का कटाव तेजी से बढ़ रहा था, जिससे बाढ़ का खतरा और उपजाऊ जमीन बंजर होने लगी थी। चीन ने अपनी खाद्य सुरक्षा को मजबूत करने के लिए जंगलों को दोबारा उगाया।
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ग्लोबल इमेज (जलवायु राजनीति) को सुधारना: दुनिया भर में चीन पर यह आरोप लगता रहा है कि उसने विकास के नाम पर धरती को नुकसान पहुँचाया है। ऐसे में बड़े पैमाने पर पेड़ लगाकर वह दुनिया को दिखाना चाहता है कि वह पर्यावरण को लेकर गंभीर है।
एक नजर में समझें चीन के वनीकरण का सफर
क्या सिर्फ पेड़ लगाने से पर्यावरण का संकट टल जाएगा?
असली समस्या की जड़ कुछ और है
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि पेड़ लगाना एक बहुत ही सराहनीय कदम है, लेकिन यह प्रदूषण का कोई जादुई इलाज नहीं है। अगर कोई देश एक तरफ लगातार कोयला जलाता रहे, भारी उद्योगों को बढ़ावा देता रहे और दूसरी तरफ सिर्फ पेड़ लगाता रहे, तो उसका कुल असर बहुत सीमित होता है। पेड़ पर्यावरण को सुधारने में मदद जरूर करते हैं, लेकिन वे प्रदूषण की असली जड़ यानी जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels) पर निर्भरता को खत्म नहीं कर सकते।
चीन का यह मॉडल हमारे लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
चीन की यह कहानी पूरी दुनिया को दो बातें एक साथ सिखाती है। पहली यह कि अगर आप प्रकृति को नजरअंदाज करके सिर्फ फैक्ट्रियों और पैसों के पीछे भागेंगे, तो पर्यावरण आपको बहुत भयानक सजा देगा। दूसरी बात यह कि जब संकट सिर पर आ जाए, तो बड़े से बड़ा प्रदूषक देश भी पूरी इच्छाशक्ति के साथ सुधार की राह पर चल सकता है।
आज चीन न सिर्फ पेड़ लगा रहा है, बल्कि वह सौर ऊर्जा (Solar Energy), पवन ऊर्जा और इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) के बाजार में भी दुनिया का नेतृत्व कर रहा है। वह प्रदूषण की समस्या का सबसे बड़ा हिस्सा भी है, और अब समाधान का एक मुख्य जरिया भी बनना चाहता है।