शारदीय नवरात्रि 2026: मां कालरात्रि की पूजा से दूर होंगे सारे संकट, जानें शुभ मुहूर्त, विधि और कथा

सनातन संस्कृति और पर्वों के इस पावन मौसम में शारदीय नवरात्रि (Shardiya Navratri 2026) का पर्व बहुत ही धूमधाम के साथ मनाया जा रहा है। आज 17 अक्टूबर 2026 को नवरात्रि का सातवां दिन है, जो जगत जननी मां दुर्गा के सातवें स्वरूप मां कालरात्रि (Maa Kalaratri) की आराधना को समर्पित है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां कालरात्रि का यह स्वरूप भयंकर और डरावना अवश्य है, लेकिन यह अपने भक्तों के लिए हमेशा अत्यंत शुभ फलदायी होता है। इन्हें 'शुभंकरी' भी कहा जाता है। मां कालरात्रि की सच्चे मन से पूजा करने से जीवन के सभी प्रकार के भय, अकाल मृत्यु का डर, नकारात्मक ऊर्जा और शत्रु बाधा हमेशा के लिए समाप्त हो जाती है। आइए जानते हैं सातवें दिन के शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और इस दिन से जुड़ी पौराणिक कथा के बारे में।
मां कालरात्रि की पूजा का शुभ मुहूर्त और पंचांग
धार्मिक अनुष्ठानों और पूजा-पाठ में सही समय यानी मुहूर्त का विशेष महत्व होता है। शारदीय नवरात्रि के सातवें दिन मां कालरात्रि की कृपा पाने के लिए आप निम्नलिखित शुभ मुहूर्तों में उनकी आराधना कर सकते हैं:
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ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 04:59 बजे से सुबह 05:47 बजे तक
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अभिजीत मुहूर्त: सुबह 11:43 बजे से दोपहर 12:38 बजे तक
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अपराह्न (संध्या) पूजा मुहूर्त: दोपहर 03:54 बजे से शाम 06:14 बजे तक
इन मुहूर्तों में की गई पूजा विशेष फलदायी मानी जाती है, जिससे माता की असीम कृपा साधक और उसके पूरे परिवार पर बनी रहती है।
मां कालरात्रि की विधि-विधान से पूजा कैसे करें?
मां कालरात्रि के पूजन की प्रक्रिया बेहद सरल लेकिन पूर्ण निष्ठा वाली होती है। सप्तमी तिथि के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करने के बाद साफ और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद माता के दरबार को सजाएं और विधि-विधान से उनका पूजन शुरू करें:
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सबसे पहले मां कालरात्रि की प्रतिमा या तस्वीर को पवित्र जल से स्नान कराएं और उन्हें साफ वस्त्र अर्पित करें।
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देवी को कुमकुम, सिंदूर, लाल चंदन और सुगंधित लाल फूल (विशेषकर गुड़हल या चमेली) अर्पित करें।
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माता के समक्ष शुद्ध देसी घी का दीपक और धूपबत्ती जलाएं।
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सच्चे मन से देवी की आरती करें और उनके बीज मंत्र 'क्लीं ऐं श्री कालिकायै नम:' का अधिक से अधिक जाप करें।
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पूजा के दौरान मां कालरात्रि की व्रत कथा का पाठ अवश्य करें।
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अंत में माता को गुड़ या गुड़ से बनी मिठाइयों का भोग लगाएं, क्योंकि धार्मिक मान्यता है कि मां कालरात्रि को गुड़ अत्यंत प्रिय है।
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पूजा संपन्न होने के बाद परिवार के सभी सदस्यों में प्रसाद वितरित करें और स्वयं भी ग्रहण करें।
मां कालरात्रि से जुड़ी पौराणिक कथा और रक्तबीज का संहार
पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन काल में शुंभ, निशुंभ और रक्तबीज नाम के महाशक्तिशाली राक्षसों ने तीनों लोकों में भयंकर हाहाकार मचा रखा था। उनके अत्याचारों से त्रस्त होकर सभी देवी-देवता घबरा गए और इस संकट से मुक्ति पाने के लिए माता दुर्गा की शरण में पहुंचे। तब माता पार्वती ने विकट परिस्थितियों को देखते हुए मां दुर्गा का रूप धारण किया और राक्षसों का वध करना शुरू किया।
कथा के अनुसार, जब मां दुर्गा महासंग्राम में राक्षस रक्तबीज का वध करने आगे आईं, तो उसे एक खास वरदान प्राप्त था कि यदि उसके शरीर से खून (रक्त) की एक भी बूंद जमीन पर गिरेगी, तो उसकी ही तरह सैकड़ों नए राक्षस उत्पन्न हो जाएंगे। इस वजह से कोई भी देवता उसका वध करने में सफल नहीं हो पा रहा था। तब माता दुर्गा ने अपने तेज और कोप से मां कालरात्रि का अत्यंत भयंकर स्वरूप धारण किया। मां कालरात्रि ने युद्ध के दौरान रक्तबीज के शरीर से निकलने वाले हर एक रक्त की बूंद को जमीन पर गिरने से पहले ही अपने मुख में ले लिया। इस प्रकार मां कालरात्रि ने उस महादानव का अंत किया और संसार को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई।