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बंगाल के चुनावी रण में सड़कों और दीवारों पर उतरी लोकतंत्र की कला, डिजिटल दौर में भी बना रहा ग्रैफिटी का जादू

News India Live, Digital Desk : दीवारें बोल उठेंगी..” विज्ञापन की यह मशहूर पंचलाइन शायद बंगाल की गलियों को देखकर ही रची गई होगी। प्रयागराज के कुंभ की रौनक हो या अयोध्या की गाथा कहती दीवारें, वॉल पेंटिंग हर जगह संवाद करती है। लेकिन पश्चिम बंगाल का मिजाज ज़रा जुदा है। यहाँ दीवारें सिर्फ ईंट-गारे का ढांचा नहीं, बल्कि भावनाओं, विद्रोह और विचारधाराओं का जीवित कैनवस हैं। कोरोना काल में घर में रहने की नसीहत हो या 2024 के आरजी कर मेडिकल कॉलेज कांड पर उमड़ा जन-आक्रोश, बंगाल की हर गली अपनी एक कहानी सुनाती है।विरासत में मिली है चित्रकारी की कलाबंगाल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहाँ हर शख्स के भीतर एक कलाकार छिपा है। चाहे वह राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी हों या पूर्व केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो, यहाँ के राजनेता अपनी कूची से कैनवस पर रंग भरना बखूबी जानते हैं। यह कला सिर्फ नेताओं तक सीमित नहीं है; शिक्षक, छात्र और अफसर—सभी इस विरासत को सहेजे हुए हैं। फुटबॉल वर्ल्ड कप के दौरान ब्राजील और अर्जेंटीना के रंगों में रंगी गलियां इसका जीता-जागता प्रमाण हैं।डिजिटल युग में भी ‘वॉल आर्ट’ का जलवा बरकरारआज के दौर में जब चुनाव प्रचार फेसबुक, इंस्टाग्राम और एक्स (Twitter) जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर सिमट रहा है, बंगाल ने अपनी पारंपरिक ‘ग्रैफिटी’ (Graffiti) और भित्तिचित्रों के प्रभाव को कम नहीं होने दिया। 2026 के विधानसभा चुनाव में भी सोशल मीडिया के धुआंधार कैंपेन के बीच दीवारों पर उकेरे गए भाजपा और टीएमसी के चुनाव चिन्ह अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं।क्यों खास है बंगाल की राजनीतिक ग्रैफिटी?सांस्कृतिक जड़ें: कोलकाता की ऐतिहासिक पहचान यहाँ की कलात्मक दीवारों से जुड़ी है।सजीव संवाद: ये पेंटिंग्स हर राहगीर से हर रोज संवाद करती हैं, जो डिजिटल विज्ञापनों से कहीं ज्यादा स्थायी प्रभाव छोड़ती हैं।कार्यकर्ताओं का जुनून: भाजपा के एक नेता ने हाल ही में कहा था कि उन्हें बाहर से पेंटर्स बुलाने की जरूरत कम ही पड़ती है। पार्टी के कार्यकर्ता खुद अपनी मर्जी और हुनर से दीवारों को रंग देते हैं।जनता का जुड़ाव: जब घर की दीवार बन जाती है विचारधाराबंगाल में राजनीति सिर्फ बूथ तक सीमित नहीं, बल्कि लोगों के घरों तक पहुंचती है। यहाँ यह आम बात है कि लोग अपनी निजी संपत्ति और घरों की दीवारों पर राजनीतिक संदेश लिखवाने या पेंट कराने के लिए सहर्ष तैयार हो जाते हैं। यह इस बात का संकेत है कि बंगाल की जनता के लिए चुनाव सिर्फ एक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक उत्सव और वैचारिक अभिव्यक्ति का माध्यम है।आक्रोश और उम्मीद का संगमतस्वीरें गवाह हैं कि बंगाल की दीवारें सिर्फ वोट नहीं मांगतीं, वे जवाब भी मांगती हैं। आरजी कर कांड पर बनी तस्वीरें न्याय की पुकार लगाती हैं, तो वहीं पुरानी पेंटिंग्स हमें इतिहास और कोरोना जैसी आपदाओं में संयम की याद दिलाती हैं। चुनाव के इस मौसम में, बंगाल की ये ‘बोलती दीवारें’ यह साबित कर रही हैं कि लोकतंत्र के इस महापर्व में कला और विचार का संगम ही इस राज्य को सबसे अलग और खास बनाता है।

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