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कम बारिश हुई तो भड़केगी महंगाई, आम आदमी की रसोई का बजट बिगड़ना तय; जानें RBI बुलेटिन की बड़ी चेतावनियां

अगर इस साल देश में मानसून उम्मीद से कम रहा, तो आम आदमी की रसोई का मासिक बजट पूरी तरह से डगमगा सकता है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने अपने जून 2026 के ताजा बुलेटिन में बेहद साफ और कड़े शब्दों में चेतावनी दी है कि कमजोर दक्षिण-पश्चिम मानसून देश की रफ्तार को धीमा कर सकता है। इसके साथ ही, यह बाजार में महंगाई की आग को एक बार फिर से भड़का सकता है। मौजूदा समय में वैश्विक स्तर पर कई बड़ी कूटनीतिक चुनौतियां बनी हुई हैं, जिनमें अमेरिका-ईरान शांति समझौते पर टिकी दुनिया की नजरें सबसे प्रमुख हैं। केंद्रीय बैंक का मानना है कि इन तमाम अंतरराष्ट्रीय दबावों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था अंदरूनी तौर पर मजबूती से खड़ी है, लेकिन घरेलू मोर्चे पर खराब मौसम सीधे आम जनता की जेब पर गहरा और सीधा असर डाल सकता है।

खाने-पीने की चीजें होंगी महंगी, मई के आंकड़ों ने बढ़ाई चिंता

रिजर्व बैंक की इस ताजा आर्थिक रिपोर्ट का सीधा इशारा है कि मानसून की बेरुखी सबसे पहले खाने-पीने की आवश्यक चीजों के दाम बढ़ाएगी। जब देश में बारिश कम होती है, तो सीधे तौर पर कृषि उत्पादन (फसलों की पैदावार) घट जाता है, जिससे सप्लाई चेन पूरी तरह चरमरा जाती है। इसका सीधा और पहला नतीजा यह होता है कि खुले बाजार में अनाज, दालों से लेकर हरी सब्जियों तक की कीमतें आसमान छूने लगती हैं।

मई महीने के सरकारी आंकड़े पहले ही इस खतरे की गवाही दे रहे हैं। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) पर आधारित देश की रिटेल महंगाई दर अप्रैल के 3.5% से बढ़कर मई में 3.9% पर पहुंच चुकी है। इस बढ़ोतरी में खाद्य पदार्थों के साथ-साथ ईंधन (पेट्रोल-डीजल) की बढ़ती कीमतों का बहुत बड़ा हाथ रहा है। तेल कंपनियों द्वारा हाल ही में खुदरा कीमतों में किए गए बदलावों ने माल ढुलाई और ट्रांसपोर्टेशन को महंगा कर दिया है। इसके अलावा 'कोर इंफ्लेशन' (जिसमें खाद्य व ईंधन शामिल नहीं होते) में भी उछाल दर्ज किया गया है। यह पूरी स्थिति आम नौकरीपेशा आदमी के मासिक खर्चों को सीधे तौर पर बढ़ा रही है।

ग्लोबल टेंशन के बीच भारत के पास है मजबूत आर्थिक ढाल

इस समय दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाएं बेहद नाजुक और अनिश्चित दौर से गुजर रही हैं। आरबीआई ने अपने बुलेटिन में स्पष्ट किया है कि अगर अमेरिका-ईरान के बीच हुआ अंतरिम शांति समझौता किसी भी वजह से टूटता है, तो पूरी दुनिया के लिए इसके बेहद गंभीर और विनाशकारी परिणाम हो सकते हैं। इससे वैश्विक स्तर पर महंगाई की उम्मीदें फिर भड़क सकती हैं, बड़े निवेशों में देरी हो सकती है, खाद्य सुरक्षा का संकट गहरा सकता है और महत्वपूर्ण ऊर्जा बुनियादी ढांचे (Energy Infrastructure) में बाधाएं पैदा हो सकती हैं। इन सब का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय व्यापार, कमोडिटी (कच्चे तेल व सोने) की कीमतों और पूंजी प्रवाह के जरिए भारत तक भी पहुंचेगा।

हालांकि, राहत की बात यह है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत ने अपने आर्थिक मोर्चे पर एक बहुत मजबूत ढाल तैयार कर ली है। भारत का रिकॉर्ड विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserve), स्थिर चालू खाता संतुलन (Current Account Balance), मजबूत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) और लगातार उच्च विकास दर की बदौलत हमारी स्थिति वैश्विक झटकों को सहने के मामले में दुनिया के कई अन्य बड़े देशों के मुकाबले काफी बेहतर है।

ब्याज दरें स्थिर, लेकिन विकास दर (GDP) का अनुमान घटा

देश की आर्थिक ग्रोथ की बात करें तो वर्ष 2025-26 की चौथी तिमाही में भारत ने 7.8% की शानदार और ऐतिहासिक विकास दर दर्ज की थी, जिसमें घरेलू खपत और निश्चित निवेश का सबसे बड़ा योगदान रहा। चालू वित्त वर्ष (2026-27) के शुरुआती दो महीनों के हाई-फ्रीक्वेंसी इंडिकेटर्स भी इस सकारात्मक रफ्तार के जारी रहने का संकेत दे रहे हैं। भारत का बाहरी व्यापारिक क्षेत्र भी काफी लचीला बना हुआ है। हालांकि, भविष्य की चिंताओं, अल नीनो के प्रभाव और मानसूनी अनिश्चितताओं को देखते हुए आरबीआई ने एहतियातन वित्त वर्ष 2027 के लिए वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर (Real GDP Growth) का अपना अनुमान 6.9% से घटाकर 6.6% कर दिया है।

फिलहाल महंगी ही रहेगी लोन की EMI, न्यूट्रल हुआ रुख

महंगाई के इसी मोर्चे को काबू में रखने के लिए केंद्रीय बैंक की मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने अपनी जून 2026 की द्विमासिक समीक्षा बैठक में सर्वसम्मति से मुख्य नीतिगत दर यानी रेपो रेट (Repo Rate) को 5.25% पर बिना किसी बदलाव के पूरी तरह से स्थिर रखा है। इसके साथ ही समिति ने अपना रुख ‘न्यूट्रल’ (तटस्थ) बनाए रखा है।

इसका सीधा और आसान अर्थ यह हुआ कि जब तक पश्चिम एशिया का भू-राजनीतिक तनाव, अल नीनो का असर और मानसून की वास्तविक स्थिति पूरी तरह से साफ नहीं हो जाती, तब तक आरबीआई ब्याज दरों को घटाने जैसा कोई भी बड़ा कदम उठाने से पूरी तरह बचेगा। आम जनता के लिए इसका सीधा मतलब यह है कि फिलहाल होम लोन या कार लोन की ईएमआई (EMI) में किसी भी तरह की बड़ी राहत मिलने की उम्मीद बेहद कम है।

राज्यों के राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) के संकेतकों में इस साल थोड़ा सा क्षरण या गिरावट जरूर दिखी है, लेकिन केंद्र सरकार के अनंतिम खाते (2025-26) राजकोषीय समेकन की दिशा में एक भरोसेमंद और मजबूत तस्वीर पेश कर रहे हैं, जहां देश का सकल राजकोषीय घाटा जीडीपी के 4.4% के भीतर सीमित रखने में सफलता मिली है।

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