पैन-इंडिया के चक्कर में डूबा साउथ सिनेमा? ‘द राजा साब’ से लेकर ‘केडी’ तक बॉक्स ऑफिस पर ढेर

साउथ फिल्म इंडस्ट्री के लिए पिछला कुछ समय बेहद निराशाजनक रहा है। 'बाहुबली', 'पुष्पा' और 'आरआरआर' जैसी फिल्मों से पूरे देश में डंका बजाने वाले साउथ सिनेमा की कई बड़ी बजट फिल्में बॉक्स ऑफिस पर औंधे मुंह गिर गई हैं। इनमें प्रभास की ‘द राजा साब’, ‘केडी: द डेविल’, ‘पेद्दी’ और ‘मना शंकर वर प्रसाद गारू’ जैसी मोस्ट अवेटेड फिल्में शामिल हैं, जिनसे मेकर्स को भारी उम्मीदें थीं। इस असफलता ने पूरी इंडस्ट्री को हिलाकर रख दिया है और अब बड़े-बड़े सुपरस्टार्स के स्टारडम पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।
सितारों की आसमानी फीस और कमजोर कहानी बनी विलेन
साउथ सिनेमा के इस बुरे दौर की सबसे बड़ी वजह सुपरस्टार्स की भारी-भरकम फीस बन गई है। फिल्म के कुल बजट का एक बहुत बड़ा हिस्सा अकेले लीड एक्टर की जेब में चला जाता है। नतीजतन, राइटिंग, स्क्रीनप्ले और वीएफएक्स जैसी तकनीकी चीजों के लिए नाममात्र का बजट बचता है। मेकर्स कहानी से ज्यादा हीरो की इमेज चमकाने, स्लो-मोशन एंट्री और भारी-भरकम डायलॉग्स पर ध्यान दे रहे हैं, जिससे स्क्रीनप्ले का कबाड़ा हो रहा है।
पुराना फॉर्मूला फेल, सिर्फ स्टार पावर से नहीं चलतीं फिल्में
'बाहुबली' और 'केजीएफ' की अपार सफलता के बाद हर मेकर अपनी फिल्म को 'पैन-इंडिया' ब्लॉकबस्टर बनाने की अंधी दौड़ में शामिल हो गया है। इस चक्कर में असली जज्बात और मजबूत कहानी को छोड़कर सिर्फ महंगे सेट्स और स्टार पावर पर पानी की तरह पैसा बहाया जा रहा है। आज सोशल मीडिया और ओटीटी के दौर में दर्शक बेहद जागरूक हो चुके हैं। वे सिर्फ किसी बड़े सुपरस्टार का चेहरा देखकर थियेटर की टिकट नहीं खरीद रहे, बल्कि उन्हें नए कंटेंट की तलाश है।
ओटीटी का बढ़ा असर, कंटेंट को ही राजा मान रही जनता
दर्शकों को अच्छी तरह पता है कि कोई भी नई फिल्म रिलीज के कुछ ही हफ्तों बाद उनके मोबाइल स्क्रीन यानी ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर आ जाएगी। ऐसे में वे सिनेमाघरों का रुख तभी करते हैं जब फिल्म में कुछ बेहद खास और अनोखा हो। इसका सबसे बुरा असर उन औसत फिल्मों पर पड़ रहा है जो पहले सिर्फ स्टार्स के नाम पर चल जाया करती थीं। साउथ सिनेमा के पास आज भी बेहतरीन डायरेक्टर्स और टेक्नीशियन्स की फौज है, बस जरूरत इस बात की है कि वे स्टार सिस्टम के ग्लैमर से बाहर निकलकर दोबारा मजबूत कहानियों पर दांव लगाना शुरू करें।