धर्म

चातुर्मास 25 जुलाई से, तो फिर 12 जुलाई से ही क्यों बंद हो रहे मांगलिक कार्य? जानें इसके पीछे की असली वजह

सनातन धर्म में चातुर्मास का विशेष महत्व है, जो इस साल 25 जुलाई से शुरू होने जा रहा है। भगवान विष्णु के क्षीरसागर में योग निद्रा में जाने के साथ ही अगले चार महीनों के लिए सभी शुभ कार्य रुक जाते हैं। लेकिन इस बार देश भर के श्रद्धालुओं और शादी-ब्याह की योजना बना रहे परिवारों के बीच एक बड़ा संशय बना हुआ है कि जब चातुर्मास 25 जुलाई को देवशयनी एकादशी से लग रहा है, तो मांगलिक कार्यों पर रोक 12 जुलाई से ही क्यों लग रही है। ज्योतिषियों और पंडितों ने इसके पीछे की जो बड़ी वजह बताई है, उसे हर किसी के लिए जानना बेहद जरूरी है।

भद्रा और शुक्र-गुरु तारा अस्त होने का गणित, इसलिए 12 जुलाई से थमेंगी शहनाइयां

पंचांग और ज्योतिषीय गणना के अनुसार, देवशयनी एकादशी से पहले ही ग्रहों की स्थिति में बड़ा बदलाव आ रहा है। दरअसल, 12 जुलाई के बाद से ही विवाह के लिए आवश्यक शुभ मुहूर्त, शुक्र और गुरु तारे की स्थिति और भद्रा दोष के कारण समाप्त हो रहे हैं। सनातन परंपरा में गुरु और शुक्र के उदित रहते ही विवाह संपन्न होते हैं। इसके साथ ही सूर्य देव का कर्क राशि में प्रवेश (कर्क संक्रांति) भी इसी दौरान हो रहा है, जिससे खरमास जैसी स्थितियां बनती हैं। यही कारण है कि औपचारिक रूप से चातुर्मास शुरू होने के करीब दो हफ्ते पहले यानी 12 जुलाई से ही देश भर में शादियों और गृह प्रवेश जैसे बड़े मांगलिक कार्यों पर पूरी तरह विराम लग जाएगा।

अगले चार महीने क्या करें और क्या न करें, जानिए जरूरी नियम

चातुर्मास के इन चार महीनों (श्रावण, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक) के दौरान धार्मिक दृष्टिकोण से कुछ खास सावधानियां बरतने की सलाह दी जाती है। इस अवधि में सात्विक जीवन शैली अपनाना सबसे उत्तम माना गया है। नियमों के अनुसार, इन चार महीनों में तामसिक भोजन, लहसुन, प्याज, मांस-मदिरा और हरी पत्तेदार सब्जियों (विशेषकर सावन में पालक और भादों में दही) के सेवन से परहेज करना चाहिए। इसके विपरीत, इस समय में नियमित रूप से भगवान विष्णु और शिव जी की आराधना, महामृत्युंजय मंत्र का जाप, दान-पुण्य, व्रत रखना और श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण करना बेहद फलदायी माना जाता है। इससे शारीरिक स्वास्थ्य भी बेहतर रहता है।

Back to top button