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अब बिना मर्जी नहीं बनेगी APAAR ID? सुप्रीम कोर्ट ने CBSE से कहा – पेरेंट्स को दें ‘हां’ या ‘ना’ का विकल्प

देश भर के स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों और उनके अभिभावकों के लिए शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी एक बहुत बड़ी और राहत भरी खबर सामने आ रही है। वन नेशन, वन स्टूडेंट आईडी यानी 'अपार आईडी' (APAAR ID) के निर्माण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद अहम और सख्त रुख अपनाया है। सर्वोच्च अदालत ने केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड यानी सीबीएसई (CBSE) को यह स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि छात्रों की यह विशेष आईडी बनाते समय माता-पिता की सहमति अनिवार्य रूप से ली जानी चाहिए। कोर्ट ने स्कूलों और बोर्ड को साफ कर दिया है कि पेरेंट्स के पास इसके लिए 'हां' या 'ना' कहने का स्पष्ट विकल्प होना चाहिए ताकि किसी भी बच्चे की पहचान से जुड़ा यह डेटा बिना मर्जी के शेयर न हो सके। आइए जानते हैं कि इस पूरे मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कुछ कहा है और इसका स्कूली शिक्षा प्रणाली पर क्या असर पड़ेगा।

क्या है APAAR ID और क्यों उठ रहे थे इस पर सवाल

केंद्र सरकार की डिजिटल इंडिया पहल के तहत 'ऑटोमेटेड परमानेंट एकेडमिक अकाउंट रजिस्ट्री' यानी अपार आईडी को देश के हर छात्र के लिए एक यूनिक डिजिटल पहचान के रूप में लाया गया है। इस आईडी के जरिए छात्र के शैक्षणिक रिकॉर्ड, खेलकूद, प्रमाणपत्र और अन्य उपलब्धियों को एक ही डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सुरक्षित रखने का दावा किया जाता है। हालांकि, पिछले कुछ समय से डेटा प्राइवेसी और बच्चों की व्यक्तिगत जानकारी की सुरक्षा को लेकर अभिभावकों और विभिन्न संगठनों के मन में लगातार चिंताएं बनी हुई थीं। कई जगहों पर यह शिकायतें मिल रही थीं कि बिना पूरी जानकारी दिए या माता-पिता की स्पष्ट सहमति के ही स्कूलों द्वारा बच्चों की यह आईडी जबरन बनाई जा रही है।

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा निर्देश और पेरेंट्स के अधिकार

अभिभावकों की इन्हीं चिंताओं और याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा संज्ञान लिया है। अदालत ने सीबीएसई और संबंधित शिक्षा अधिकारियों से कहा है कि बच्चों की अपार आईडी तैयार करने की प्रक्रिया में पारदर्शिता बरती जानी चाहिए। कोर्ट के इस निर्देश के बाद अब स्कूलों की यह जिम्मेदारी होगी कि वे फॉर्म या डिजिटल पोर्टल पर ऐसा विकल्प प्रदान करें जहां माता-पिता अपनी स्वेच्छा से यह चुन सकें कि वे अपने बच्चे की अपार आईडी बनवाना चाहते हैं या नहीं। यदि कोई पेरेंट्स इसके लिए मना करते हैं, तो बच्चे की शिक्षा या स्कूल की अन्य गतिविधियों पर इसका कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए।

डेटा प्राइवेसी और शिक्षा जगत के लिए इसका महत्व

आज के डिजिटल युग में बच्चों के डेटा की सुरक्षा और उनकी गोपनीयता सबसे बड़ा मुद्दा बन चुका है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला लाखों-करोड़ों अभिभावकों को यह अधिकार देता है कि वे अपने बच्चों की डिजिटल प्रोफाइल के मामलों में खुद निर्णय ले सकें। शिक्षाविदों और कानूनी जानकारों का मानना है कि सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता और नागरिकों की सहमति का अधिकार लोकतंत्र की एक अहम नींव है। आने वाले दिनों में सीबीएसई और अन्य राज्य बोर्डों द्वारा इस निर्देश के तहत नए और स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाने की उम्मीद है, जिससे स्कूलों में चल रही इस प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी बनाया जा सके।

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