धर्म

भगवान शिव के 7 तांडव स्वरूप: सावन में जानें रौद्र और आनंद तांडव से जुड़ी पौराणिक कथा और इसके गहरे रहस्य

पवित्र और आस्था से परिपूर्ण सावन का महीना चल रहा है, जो देवों के देव महादेव भगवान शिव को समर्पित है। सनातन संस्कृति में भगवान शिव के हर एक रूप और लीला का अपना विशेष आध्यात्मिक महत्व है। ऐसी ही एक अलौकिक और दिव्य लीला उनका 'तांडव नृत्य' है। शिव पुराण के अनुसार, 'तांडव' शब्द सीधे तौर पर भगवान शिव से जुड़ा हुआ है। महादेव कुल 7 अलग-अलग रूपों में तांडव करते हैं, जो सृष्टि के सृजन, संचालन, आनंद और विनाश से जुड़े हुए हैं। आज सावन के इस खास अवसर पर हम आपको भगवान शिव के सबसे प्रमुख और लोकप्रिय रूपों यानी 'रौद्र तांडव' और 'आनंद तांडव' से जुड़ी पौराणिक कथाओं के बारे में विस्तार से बता रहे हैं।

रौद्र तांडव: माता सती का देह त्याग और महादेव का प्रचंड क्रोध

भगवान शिव के रौद्र या रुद्र तांडव से जुड़ी कथा उनके सबसे भयानक, विनाशकारी और प्रचंड क्रोध वाले रूप को दर्शाती है। पौराणिक कथा के अनुसार, यह वह समय था जब माता सती अपने पिता राजा दक्ष द्वारा बिना बुलाए आयोजित किए गए विशाल यज्ञ में शामिल होने मायके चली गई थीं। वहां राजा दक्ष ने सबके सामने माता सती और भगवान शिव का अपमान किया था, जिसे माता सती सहन नहीं कर पाईं और उन्होंने उसी यज्ञ की पवित्र अग्नि में कूदकर अपने प्राण त्याग दिए।

जब इस वीभत्स घटना की खबर महादेव को मिली, तो वह गहरे शोक और बेकाबू क्रोध से भर गए। अपने दुख और गुस्से में शिव जी ने अपनी एक जटा उखाड़ कर पर्वत पर पटकी, जिससे महाबलशाली वीरभद्र का जन्म हुआ। इसके बाद महादेव ने माता सती के पार्थिव शरीर को अपने कंधों पर उठाया और ब्रह्मांड को कंपा देने वाला रौद्र तांडव शुरू कर दिया। उनके पैरों की हर एक थाप से पृथ्वी पर भयंकर भूकंप आने लगे, समुद्र उबलने लगे और पर्वत टूटने लगे। पूरी सृष्टि को नष्ट होते देख सभी देवी-देवताओं ने भगवान विष्णु से रक्षा की गुहार लगाई। तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर को 51 भागों में विभाजित कर दिया, जो बाद में 'शक्तिपीठ' कहलाए। जैसे ही माता सती का शरीर महादेव से अलग हुआ, उनका गुस्सा शांत हुआ और तांडव रुका।

आनंद तांडव: ऋषियों का घमंड चूर करने के लिए किया गया नटराज स्वरूप नृत्य

भगवान शिव का दूसरा सबसे प्रसिद्ध रूप 'आनंद तांडव' है, जो उनके प्रसिद्ध 'नटराज' स्वरूप के दर्शन कराता है। यह नृत्य अज्ञानता के नाश, दिव्यता और सृष्टि के संतुलन का प्रतीक माना जाता है। कथा के अनुसार, एक बार कुछ अहंकारी ऋषियों को अपनी विद्या और तपस्या पर बहुत घमंड हो गया था और उन्हें लगने लगा था कि वे ईश्वर से भी सर्वशक्तिमान हैं। ऋषियों का यह अहंकार तोड़ने के लिए भगवान शिव एक साधारण भिक्षुक का रूप धारण कर उनके आश्रम पहुंचे।

जब ऋषियों ने देखा कि उनकी पत्नियां और शिष्य उस भिक्षुक रूपी शिव की ओर आकर्षित हो रहे हैं, तो वे क्रोधित हो उठे और अपनी मंत्र शक्ति से भोलेनाथ पर कई घातक प्रहार किए। ऋषियों ने एक विषैला सांप भेजा, जिसे शिवजी ने अपने गले का हार बना लिया; इसके बाद एक विशाल बाघ भेजा, जिसकी छाल उतारकर उन्होंने वस्त्र बना लिया। अंत में ऋषियों ने अपनी नकारात्मक शक्तियों से एक बौना दानव उत्पन्न किया, जो अहंकार और अज्ञानता का प्रतीक था।

भगवान शिव का आनंद तांडव और अज्ञानता का अंत

भगवान शिव ने उस बौने दानव को अपने दाहिने पैर के नीचे दबा लिया और उसकी पीठ पर खड़े होकर अलौकिक 'आनंद तांडव' शुरू कर दिया। महादेव का एक पैर अहंकार को कुचल रहा था, जबकि दूसरा पैर हवा में उठा हुआ था, जिसे मोक्ष और मुक्ति का प्रतीक माना जाता है। उनके एक हाथ में डमरू और दूसरे हाथ में प्रलय की अग्नि सुशोभित थी। यह दिव्य दृश्य देखकर उन ऋषियों का सारा अहंकार पलभर में चूर-चूर हो गया और वे महादेव के चरणों में गिरकर क्षमायाचना करने लगे।

जानें भगवान शिव के तांडव के 7 प्रमुख प्रकार

शास्त्रों के अनुसार भगवान शिव के तांडव नृत्य को 7 प्रमुख रूपों में बांटा गया है:

  • आनंद तांडव: खुशी, प्रसन्नता, उल्लास और सकारात्मकता का प्रतीक।

  • रौद्र (रुद्र) तांडव: असीम क्रोध, विनाश और उग्र रूप का प्रतीक।

  • त्रिपुर तांडव: मायावी राक्षस त्रिपुरासुर के संहार के समय किया गया नृत्य।

  • संध्या तांडव: प्रदोष काल या गोधूलि वेला (शाम के समय) किया जाने वाला नृत्य।

  • उमा तांडव: माता पार्वती के प्रति अगाध प्रेम, स्नेह और समर्पण दर्शाने वाला नृत्य।

  • संहार तांडव: महाप्रलय या सृष्टि के अंत के समय किया जाने वाला नृत्य।

  • ऊर्ध्व तांडव: अत्यंत तीव्र गति और गहन योग मुद्रा से जुड़ा हुआ नृत्य।

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