क्या बॉन्ड मार्केट की इस खतरनाक चाल का भारत के लिए कोई शुभ संकेत नहीं

ग्लोबल फाइनेंशियल मार्केट और शेयर बाजार के गलियारों में इन दिनों एक ऐसे 'सुपरस्टार' की वापसी की चर्चा सबसे ज्यादा गर्म है, जिसके नाम से ही पूरी दुनिया के शेयर बाजारों में सिहरन पैदा हो जाती है। जी हां, हम बात कर रहे हैं अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड (US Treasury Bonds) की, जिसकी यील्ड यानी प्रतिफल पिछले कुछ हफ्तों में ऐसे स्तर पर पहुंच गई है, जो पिछले 22 वर्षों के इतिहास में कभी नहीं देखा गया था। अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड की इस ताबड़तोड़ और आक्रामक वापसी ने दुनिया भर के वित्तीय विश्लेषकों की नींद उड़ा दी है। भारत जैसे उभरते हुए बाजारों (Emerging Markets) के लिए इस घटना को बिल्कुल भी अच्छा संकेत नहीं माना जा रहा है। जब-जब अमेरिका का ट्रेजरी बॉन्ड मजबूत होता है और उसकी यील्ड आसमान छूती है, तब-तब भारत जैसे विकासशील देशों से विदेशी निवेशकों (FIIs) की तिजोरी खाली होने लगती है और वे अपना सारा पैसा भारतीय शेयर बाजार से निकालकर सुरक्षित अमेरिकी बॉन्ड की तरफ भागने लगते हैं। अमेरिकी अर्थव्यवस्था की इस नई चाल ने भारतीय रिजर्व बैंक और नीति निर्माताओं की चिंताएं फिर से बढ़ा दी हैं।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार और बॉन्ड यील्ड के इस गणित को आसान शब्दों में समझें तो जब भी अमेरिका में ब्याज दरें उच्च स्तर पर बनी रहती हैं और सरकार के ट्रेजरी बॉन्ड पर निवेशकों को बिना किसी जोखिम के भारी-भरकम रिटर्न (Yield) मिलने लगता है, तो दुनिया भर का स्मार्ट पैसा (Smart Money) शेयर बाजार जैसे जोखिम भरे एसेट्स से निकलकर अमेरिका के सरकारी बॉन्ड में सुरक्षित ठिकाना तलाशने लगता है। यही कारण है कि पिछले कुछ दिनों में भारत के शेयर बाजारों में भारी बिकवाली का दौर देखने को मिला है। विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय इक्विटी से हजारों करोड़ रुपये खींच लिए हैं, जिसके कारण बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के सूचकांकों पर लगातार दबाव बना हुआ है। 22 साल बाद लौट कर आई यह ट्रेजरी बॉन्ड की आंधी ग्लोबल लिक्विडिटी को पूरी तरह से सोख रही है, जिसका सीधा असर भारत के विदेशी मुद्रा भंडार और रुपये की सेहत पर पड़ रहा है।
रुपये में कमजोरी और आयात महंगा होने का मंडराता खतरा
अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड के मजबूत होने और डॉलर इंडेक्स (US Dollar Index) में लगातार उछाल आने का सबसे पहला और घातक असर भारतीय मुद्रा यानी रुपये पर पड़ता है। जब विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से डॉलर निकालकर अमेरिका वापस ले जाते हैं, तो घरेलू बाजार में डॉलर की मांग बहुत ज्यादा बढ़ जाती है और इसके मुकाबले रुपया लगातार कमजोर होने लगता है। रुपये की इस कमजोरी का मतलब यह है कि भारत के लिए विदेशों से कच्चा तेल (Crude Oil), कोयला, सोना और अन्य जरूरी सामान आयात करना बहुत ज्यादा महंगा हो जाएगा। जब आयात का बिल बढ़ेगा, तो देश के भीतर पेट्रोल-डीजल और रोजमर्रा की चीजों की कीमतें बढ़ने का खतरा पैदा हो जाता है, जिससे अंततः आम आदमी की जेब पर महंगाई की सीधी मार पड़ती है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही, तो देश के चालू खाते के घाटे (CAD) पर भी नकारात्मक असर पड़ सकता है।
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के सामने खड़ी हुई बड़ी चुनौती
इस वैश्विक वित्तीय संकट और ट्रेजरी बॉन्ड के बढ़ते दबाव के बीच देश के केंद्रीय बैंक यानी भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के सामने एक बहुत बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। रुपये की गिरती हुई कीमत को थामने और विदेशी निवेशकों के बड़े पैमाने पर हो रहे पलायन को रोकने के लिए आरबीआई को लगातार अपने फॉरेक्स रिजर्व का इस्तेमाल करना पड़ रहा है। हालांकि भारत की आर्थिक स्थिति पिछली कई वैश्विक मंदी के दौर की तुलना में काफी मजबूत है और देश के पास पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार मौजूद है, फिर भी अमेरिका की मौद्रिक नीतियों (US Fed Policies) का यह असर भारत के घरेलू विकास चक्र को कुछ समय के लिए धीमा जरूर कर सकता है। निवेशकों और शेयर बाजार के जानकारों को अब इस बात का इंतजार है कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व अपनी अगली बैठक में ब्याज दरों को लेकर क्या रुख अपनाता है, क्योंकि उसी पर यह तय होगा कि 22 साल बाद लौटा यह बॉन्ड का भूत ग्लोबल मार्केट को और कितना डराने वाला है।