ईरान पर फिर बड़े हमले की तैयारी में अमेरिका: मिडिल ईस्ट में भारी सैन्य तैनाती

पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) का पूरा इलाका एक बार फिर बारूद के ऐसे ढेर पर बैठ गया है, जहां जरा सी चिंगारी वैश्विक तबाही की आग भड़का सकती है। संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के बीच वर्षों से जारी कूटनीतिक गतिरोध और परोक्ष युद्ध अब सीधे सैन्य टकराव के सबसे भयावह दौर में दाखिल हो चुका है। अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा विश्लेषकों, पेंटागन के सूत्रों और वैश्विक खुफिया एजेंसियों की ताजा रिपोर्टों से यह सनसनीखेज संकेत मिला है कि वाशिंगटन ईरान के खिलाफ बेहद व्यापक स्तर पर समन्वित हवाई और मिसाइल हमले करने का खाका तैयार कर रहा है। मध्य पूर्व के समुद्री जलक्षेत्र और प्रमुख एयरबेसों पर अमेरिकी रक्षा मंत्रालय ने अभूतपूर्व पैमाने पर लड़ाकू विमानों, घातक युद्धपोतों और हजारों अतिरिक्त मरीन सैनिकों की रणनीतिक तैनाती कर दी है। रणनीतिक जानकारों का मानना है कि व्हाइट हाउस में अमेरिकी मध्यावधि चुनावों की राजनीतिक प्रक्रिया पूरी होने की प्रतीक्षा की जा रही है, जिसके तुरंत बाद फारस की खाड़ी में युद्ध के सायरन गूंज सकते हैं।
3 नवंबर के मध्यावधि चुनावों पर टिकी व्हाइट हाउस की नजर: तेल की कीमतें बढ़ने के डर से टल रहा हमला
अमेरिकी खुफिया और भू-राजनीतिक हलकों में इस बात की पुरजोर चर्चा है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप संभावित सैन्य ऑपरेशन को हरी झंडी दिखाने के लिए 3 नवंबर को होने वाले अमेरिकी मध्यावधि चुनावों के संपन्न होने का इंतजार कर रहे हैं। वाशिंगटन स्थित प्रतिष्ठित थिंक टैंक ब्रूकिंग्स इंस्टीट्यूशन की विदेश नीति निदेशक सुजैन मलोनी के गहन विश्लेषण के अनुसार, ट्रंप प्रशासन चुनाव से ठीक पहले कोई भी सीधा युद्ध छेड़ने से जानबूझकर बच रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि ईरान पर हमला होते ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें अचानक आसमान छूने लगेंगी, जिससे अमेरिका के घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीजल के दाम भड़क सकते हैं। ऐसी स्थिति में अमेरिकी मतदाताओं के बीच बढ़ती महंगाई का सीधा नुकसान रिपब्लिकन पार्टी को मतदान पेटियों में उठाना पड़ सकता है। हालांकि, मलोनी का स्पष्ट आकलन है कि 3 नवंबर को जैसे ही वोटिंग प्रक्रिया समाप्त होगी, वाशिंगटन पर घरेलू राजनीतिक दबाव खत्म हो जाएगा और ट्रंप प्रशासन ईरान के सामरिक, परमाणु और मिसाइल ठिकानों पर विनाशकारी हमले शुरू करने का आदेश जारी कर सकता है।
यूएसएस थियोडोर रूजवेल्ट समेत 3 विमानवाहक पोत तैनात: इजरायल हाई अलर्ट पर, खाड़ी बनी सैन्य छावनी
ईरान की घेराबंदी को अभेद्य बनाने के उद्देश्य से अमेरिकी नौसेना (US Navy) ने अपनी सबसे ताकतवर स्ट्राइक फ्लीट्स को अरब सागर और फारस की खाड़ी के मुहाने पर उतार दिया है। अमेरिकी नौसेना के तीन विशालकाय न्यूक्लियर पावर्ड एयरक्राफ्ट कैरियर, जिनमें 'यूएसएस थियोडोर रूजवेल्ट' प्रमुख है, अपने पूरे स्ट्राइक ग्रुप के साथ खाड़ी के रणनीतिक जलक्षेत्र में गश्त कर रहे हैं। इन पोतों पर आधुनिक रडार से बच निकलने वाले पांचवीं पीढ़ी के एफ-35 स्टील्थ फाइटर जेट्स और दर्जनों टॉमहॉक क्रूज मिसाइलों से लैस गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर तैनात हैं। इसके अतिरिक्त, अमेरिकी सेना की मरीन एक्सपेडिशनरी यूनिट्स (MEU) को भी त्वरित जमीनी और समुद्री कार्रवाई के लिए इलाके में उतार दिया गया है। दूसरी ओर, संभावित ईरानी जवाबी कार्रवाई के खतरे को भांपते हुए इजरायली रक्षा बलों (IDF) को भी सर्वोच्च युद्ध स्तर यानी 'रेड अलर्ट' पर रख दिया गया है। इजरायल ने अपने एरो-3, डेविड्स स्लिंग और आयरन डोम जैसे अत्याधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम को पूरी तरह सक्रिय कर दिया है ताकि ईरान या उसके सहयोगी संगठनों की ओर से होने वाले किसी भी रॉकेट व बैलिस्टिक मिसाइल हमले को हवा में ही नेस्तनाबूद किया जा सके।
हॉर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों पर हमले और नाकेबंदी: दुनिया की 20 फीसदी तेल सप्लाई पर गहरा संकट
वर्तमान समय में यह संघर्ष केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि समुद्र में दोनों पक्षों के बीच 'टैंकर वॉर' की खतरनाक शुरुआत हो चुकी है। अमेरिका और ईरान खुले तौर पर एक-दूसरे के व्यापारिक और वाणिज्यिक जहाजों (कमर्शियल शिप्स) को निशाना बना रहे हैं। अमेरिकी नौसेना जहां अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों की आड़ में ईरानी तेल ले जाने वाले जहाजों को जब्त करने और ईरान के प्रमुख बंदरगाहों की अघोषित समुद्री नाकेबंदी करने में जुटी है, वहीं इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) दुनिया के सबसे संवेदनशील और संकरे तेल गलियारे 'स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज' पर अपनी सैन्य पकड़ मजबूत करने के लिए आक्रामक युद्धाभ्यास कर रही है। वैश्विक समुद्री व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत कच्चा तेल इसी हॉर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। ईरान ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि उसके तेल निर्यात और बंदरगाहों पर हमला हुआ, तो वह इस पूरे जलमार्ग को पूरी तरह बंद कर देगा, जिससे एशिया और यूरोप समेत पूरी दुनिया में ऊर्जा का अभूतपूर्व संकट खड़ा हो सकता है।
वैश्विक अर्थव्यवस्था पर मंडराया तीसरे विश्वयुद्ध का साया: विशेषज्ञों ने दी गंभीर मानवीय संकट की चेतावनी
यदि अमेरिका और ईरान के बीच यह तनाव सीधे सैन्य टकराव में तब्दील होता है, तो इसके परिणाम केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेंगे। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी हमलों के जवाब में ईरान के पास हजारों की तादाद में सटीक मार करने वाली बैलिस्टिक मिसाइलें और आत्मघाती ड्रोन हैं, जिनका इस्तेमाल वह खाड़ी देशों में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर कर सकता है। लेबनान से लेकर यमन तक फैले ईरान समर्थित गुट भी इस युद्ध में कूद सकते हैं, जिससे पूरा मध्य पूर्व एक लंबे और विनाशकारी क्षेत्रीय युद्ध की आग में झुलस सकता है। वैश्विक शेयर बाजारों में भारी गिरावट, सोने की कीमतों में अप्रत्याशित उछाल और ऊर्जा संकट के चलते दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाएं मंदी के गर्त में जा सकती हैं। अंतरराष्ट्रीय राजनयिक मंचों पर शांति की अपीलें हो रही हैं, लेकिन दोनों देशों की आक्रामक रणनीतियों और सैन्य जमावड़े को देखते हुए 3 नवंबर के बाद का समय पूरी दुनिया के लिए सांसें थाम देने वाला साबित होने वाला है।