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सोने-चांदी के कारोबार से जगमगाती थी विजयनगर साम्राज्य की राजधानी

दक्षिण भारत की धरती पर कभी एक ऐसा शक्तिशाली, वैभवशाली और समृद्ध साम्राज्य आबाद था जिसकी ख्याति सात समंदर पार तक फैली हुई थी। तुंगभद्रा नदी के तट पर बसा विजयनगर साम्राज्य अपनी असीम संपत्ति, बेहतरीन नगर नियोजन और कला प्रेम के लिए दुनिया भर के व्यापारियों और यात्रियों को आकर्षित करता था। इस साम्राज्य की राजधानी हम्पी (Hampi) उस दौर में केवल एक राजनीतिक केंद्र नहीं बल्कि व्यापार, संस्कृति और स्वर्ण युग का सबसे बड़ा जीवंत प्रतीक हुआ करती थी। इतिहास के पन्नों को पलटने पर पता चलता है कि यहाँ की समृद्धि इतनी अधिक थी कि विदेशी यात्री भी यहां के वैभव को देखकर हैरान रह जाते थे। लेकिन वक्त का पहिया हमेशा एक सा नहीं रहता; किस्मत ने ऐसा पलटा खाया कि एक ही युद्ध ने इस सोने की चिड़िया जैसी राजधानी को खंडहरों के ढेर में तब्दील कर दिया। आइए जानते हैं हम्पी के उत्कर्ष से लेकर उसके पतन तक की पूरी और रोमांचक दास्तान।

सोने-चांदी और हीरों के खुले बाजार, जहां सड़कों पर बिकती थी बेशकीमती वस्तुएं

विजयनगर साम्राज्य के स्वर्ण काल (14वीं से 16वीं शताब्दी) के दौरान हम्पी की गिनती दुनिया के सबसे अमीर और बड़े शहरों में की जाती थी। पुर्तगाली, फारसी और अरब देशों से आने वाले व्यापारी जहाजों के जरिए यहां पहुंचते थे और व्यापार करते थे। हम्पी के बाजारों की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वहां सोने, चांदी, हीरों और जवाहरातों का क्रय-विक्रय खुलेआम सड़कों और बाजारों में होता था, ठीक वैसे ही जैसे आज के समय में आम सब्जियां या रोजमर्रा का सामान बिकता है। साम्राज्य के शासकों ने व्यापार को बढ़ावा देने के लिए ऐसी व्यवस्था बनाई थी कि देश-विदेश के व्यापारियों को पूरी सुरक्षा और सुविधाएं मिल सकें। विजयनगर के राजाओं के पास एक विशाल और शक्तिशाली सेना थी, जिसके दम पर उन्होंने दक्षिण भारत के एक बड़े भूभाग पर अपना आधिपत्य स्थापित किया था और व्यापार के नए मार्गों को विकसित किया था।

तालीकोट का वह काला दिन: जब एक विनाशकारी युद्ध ने सब कुछ तबाह कर दिया

हर उत्कर्ष के बाद पतन का नियम प्रकृति का अटल सत्य है, और विजयनगर साम्राज्य भी इससे अछूता नहीं रहा। सोलहवीं सदी के उत्तरार्ध में दक्कन के पांच मुस्लिम सल्तनतों (बीजापुर, गोलकुंडा, अहमदनगर, बीदर और बरार) ने मिलकर एक शक्तिशाली गठबंधन बनाया और विजयनगर साम्राज्य के खिलाफ निर्णायक जंग का ऐलान कर दिया। वर्ष 1565 में लड़े गए 'तालीकोट के युद्ध' (Battle of Talikota) ने भारतीय इतिहास की दिशा ही बदल दी। विजयनगर की सेना संख्या और ताकत में बड़ी होने के बावजूद आपसी रणनीतिक चूक और संयुक्त मोर्चे के भारी हमलों के आगे टिक नहीं सकी। इस युद्ध में साम्राज्य के प्रतापी शासक रामाराव की हार हुई और इसके साथ ही विजयनगर के पतन की उल्टी गिनती शुरू हो गई, जिसने इस भव्य संस्कृति को हमेशा के लिए बदल दिया।

विजेताओं की क्रूरता और हम्पी के महलों का खंडहर में तब्दील होना

तालीकोट के युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद हमलावर सेनाएं विजयनगर की राजधानी हम्पी में दाखिल हुईं और अगले कई महीनों तक इस ऐतिहासिक शहर को पूरी तरह लूटने और तहस-नहस करने का काम किया। जिन महलों में कभी संगीत, नृत्य और उत्सव गूंजते थे, उन्हें जला दिया गया और सोने-चांदी के खजाने लूट लिए गए। भव्य मंदिरों की मूर्तियों को खंडित कर दिया गया और पत्थरों की बेजोड़ कलाकृतियों को हथौड़ों से तोड़ दिया गया। जिस नगरी को बसाने में सदियों का समय लगा था, उसे चंद हफ्तों में एक वीरान खंडहर में बदल दिया गया। इस भीषण तबाही के बाद बचे हुए लोग और शासक भागकर पेनुकोंडा और चंद्रगिरी चले गए, लेकिन हम्पी की वह रौनक कभी वापस नहीं लौट सकी और वह हमेशा के लिए समय के आगोश में छिप गई।

आज के समय में हम्पी का महत्व और यूनेस्को की विश्व धरोहर का दर्जा

सदियों तक वीरान और गुमनामी के अंधेरे में रहने के बाद, आज हम्पी अपनी टूटी-फूटी दीवारों, भव्य मंदिरों और विशाल पत्थरों के जरिए अपने उसी स्वर्णिम इतिहास की दास्तान दुनिया को सुना रहा है। यूनेस्को (UNESCO) ने हम्पी की ऐतिहासिक महत्ता और वास्तुकला को देखते हुए इसे 'विश्व धरोहर स्थल' (World Heritage Site) घोषित किया है, जिसे देखने के लिए आज दुनिया भर से इतिहास प्रेमी, पुरातत्वविद और पर्यटक कर्नाटक के इस कोने में खिंचे चले आते हैं। विट्ठल मंदिर का प्रसिद्ध स्टोन चैरट (पत्थर का रथ), हजार राम मंदिर और विशालकाय नंदी की मूर्तियां आज भी उस दौर के शिल्पकारों की अद्भूत कला का जीता-जागता सुबूत हैं। हम्पी की यह कहानी हमें यह सिखाती है कि भौतिक समृद्धि चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, इतिहास के पन्नों में केवल वही सभ्यताएं अमर रहती हैं जो कला, संस्कृति और मानवीय मूल्यों को सहेजकर रखती हैं।

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