Shravan Putrada Ekadashi 2026: सावन पुत्रदा एकादशी पर शंख से करें यह चमत्कारी उपाय, शुभ मुहूर्त में पूजा से मिलेगा संतान प्राप्ति का महावरदान

सनातन धर्म में श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को 'श्रावण पुत्रदा एकादशी' (Shravan Putrada Ekadashi) और 'पवित्रा एकादशी' के नाम से जाना जाता है। एकादशी का व्रत भगवान श्रीहरि विष्णु को समर्पित होता है, लेकिन सावन माह में पड़ने के कारण इस दिन भगवान विष्णु और देवों के देव महादेव दोनों की संयुक्त कृपा प्राप्त होती है। पद्म पुराण और भविष्योत्तर पुराण के अनुसार, जो दंपति लंबे समय से संतान सुख से वंचित हैं या जिनकी संतान के जीवन में कोई संकट बना हुआ है, उनके लिए सावन पुत्रदा एकादशी का व्रत और पूजन किसी कल्पवृक्ष से कम नहीं माना गया है। इस पावन दिन पर भगवान विष्णु के प्रिय 'शंख' से किए जाने वाले विशेष ज्योतिषीय उपाय संतान बाधा को दूर कर मनचाही मनोकामना पूरी करते हैं।
सावन पुत्रदा एकादशी 2026: शुभ तिथि और पूजा मुहूर्त
वैदिक पंचांग की गणना के अनुसार, श्रावण शुक्ल एकादशी तिथि का समय इस प्रकार रहेगा:
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एकादशी तिथि प्रारंभ: 23 अगस्त 2026 को दोपहर 12:45 बजे से
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एकादशी तिथि समाप्त: 24 अगस्त 2026 को दोपहर 01:28 बजे तक
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उदयातिथि के अनुसार व्रत: उदयातिथि की मान्यता के अनुसार सावन पुत्रदा एकादशी का उपवास 24 अगस्त 2026 (सोमवार) को रखा जाएगा। सावन के सोमवार के दिन एकादशी का यह दुर्लभ संयोग शिव और हरि की असीम कृपा दिलाने वाला है।
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अभिजीत मुहूर्त (सर्वश्रेष्ठ पूजा समय): सुबह 11:58 बजे से दोपहर 12:48 बजे तक
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व्रत पारण का समय: 25 अगस्त 2026 को सुबह 05:58 बजे से सुबह 08:32 बजे के बीच
पुत्रदा एकादशी पर शंख से करें यह अचूक उपाय (Santan Prapti Upay)
शास्त्रों में दक्षिणावर्ती शंख को मां लक्ष्मी और भगवान नारायण का साक्षात स्वरूप माना गया है। एकादशी के दिन संतान प्राप्ति की कामना के लिए यह उपाय बेहद फलदायी माना जाता है:
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शंख में गाय का कच्चा दूध और केसर: एकादशी की सुबह स्नान के बाद एक दक्षिणावर्ती शंख में देसी गाय का कच्चा दूध और थोड़ा सा केसर व गंगाजल भरें।
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लड्डू गोपाल का अभिषेक: इस शंख से भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप 'लड्डू गोपाल' या शालिग्राम जी का अभिषेक करें।
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संतान गोपाल मंत्र का जाप: अभिषेक करते समय पति-पत्नी दोनों मिलकर 108 बार इस शक्तिशाली मंत्र का जाप करें:
'ॐ देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते। देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः॥'
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प्रसाद के रूप में चरणामृत ग्रहण: अभिषेक के बाद शंख से निकले पंचामृत/दूध को दोनों पति-पत्नी मिलकर श्रद्धापूर्वक प्रसाद के रूप में ग्रहण करें। मान्यता है कि इससे कुंडली का पितृ दोष और संतान बाधा समाप्त होती है।
सावन पुत्रदा एकादशी की प्रामाणिक पूजा विधि
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प्रातः संकल्प: ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें, पीले वस्त्र पहनें और भगवान विष्णु व भगवान शिव के समक्ष व्रत एवं संतान प्राप्ति का संकल्प लें।
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पूजा स्थल की स्थापना: पूजा की चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। साथ ही लड्डू गोपाल जी को विराजमान करें।
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पंचोपचार पूजन: भगवान को पीले चंदन का तिलक लगाएं, पीले फूल, तुलसी दल (तुलसी एकादशी के दिन न तोड़ें, एक दिन पहले तोड़ी गई तुलसी अर्पित करें), पीले फल और पंचामृत का भोग लगाएं।
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पुत्रदा एकादशी व्रत कथा का श्रवण: धूप और शुद्ध घी का दीपक जलाकर 'श्रावण पुत्रदा एकादशी' की पौराणिक कथा सुनें या पढ़ें।
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भगवान शिव का जलाभिषेक: सावन का सोमवार होने के कारण शिवलिंग पर जल, दूध और बेलपत्र चढ़ाकर 'ॐ नमः शिवाय' का जप करें।
मनोकामना पूर्ति के लिए इन बातों का रखें विशेष ध्यान
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चावल और तामसिक भोजन का त्याग: एकादशी के दिन घर में चावल बनाना और खाना पूरी तरह वर्जित माना गया है। सात्विक फलाहार का ही सेवन करें।
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रात्रि जागरण और भजन-कीर्तन: एकादशी की रात को सोना नहीं चाहिए। रात्रि के समय श्रीहरि के भजनों और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करने से व्रत का पूर्ण पुण्य फल प्राप्त होता है।
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द्वादशी को दान: अगले दिन (द्वादशी तिथि) ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को पीले वस्त्र, अन्न, फल और दक्षिणा दान करने के बाद ही व्रत का पारण करें।