Skanda Sashti 2026: संतान की उन्नति और शत्रुओं पर विजय के लिए 22 अप्रैल को रखें स्कंद षष्ठी व्रत, जानें शुभ मुहूर्त

News India Live, Digital Desk: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, स्कंद षष्ठी के दिन ही भगवान कार्तिकेय ने तारकासुर नामक राक्षस का वध कर देवताओं को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई थी। यह व्रत विशेष रूप से संतान प्राप्ति, बच्चों के बेहतर स्वास्थ्य और शत्रुओं पर विजय पाने के लिए किया जाता है। ज्योतिष शास्त्र में इसे ‘मंगल दोष’ की शांति के लिए भी अत्यंत लाभकारी माना गया है।1. स्कंद षष्ठी शुभ मुहूर्त (वैशाख शुक्ल षष्ठी)तिथि: 22 अप्रैल 2026, बुधवार।षष्ठी तिथि प्रारंभ: 22 अप्रैल 2026 को सुबह से।षष्ठी तिथि समाप्त: 23 अप्रैल 2026 की सुबह तक। (उदया तिथि के अनुसार व्रत 22 अप्रैल को ही रखा जाएगा।)2. पूजा विधि (Step-by-Step)स्नान और संकल्प: सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और लाल या पीले रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करें। व्रत का संकल्प लें।स्थापना: पूजा स्थान पर भगवान कार्तिकेय की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। उनके साथ शिव-पार्वती और गणेश जी की भी पूजा करें।अभिषेक: भगवान स्कंद को गंगाजल, दूध और पंचामृत से स्नान कराएं।श्रृंगार: उन्हें चंदन का तिलक लगाएं और लाल फूल, कलावा, अक्षत व फल अर्पित करें। कार्तिकेय जी को ‘मोर पंख’ चढ़ाना अत्यंत शुभ माना जाता है।भोग: दही और दूध से बनी मिठाई का भोग लगाएं।आरती व मंत्र: दीपक जलाकर स्कंद षष्ठी की कथा पढ़ें और मंत्रों का जाप करें।3. संतान के लिए विशेष उपाय (Easy Upay)यदि आप संतान के सुख या उनकी सफलता की कामना कर रहे हैं, तो इस दिन ये उपाय करें:मोर पंख का उपाय: पूजा के दौरान भगवान कार्तिकेय को 6 मोर पंख अर्पित करें और बाद में इन्हें बच्चों के स्टडी रूम या शयनकक्ष में लगा दें। इससे एकाग्रता बढ़ती है।लाल वस्तु का दान: संतान के स्वास्थ्य के लिए इस दिन जरूरतमंदों को गुड़, लाल कपड़ा या मसूर की दाल दान करें।मंत्र जाप: “ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महासैन्याय धीमही तन्नो स्कंद: प्रचोदयात” इस गायत्री मंत्र का 108 बार जाप करने से बच्चों पर आने वाली बाधाएं दूर होती हैं।4. व्रत के नियम (Do’s and Don’ts)सात्विक भोजन: इस दिन केवल फलाहार या सात्विक भोजन ही करें। तामसिक भोजन (प्याज, लहसुन, मांस-मदिरा) से पूरी तरह परहेज करें।ब्रह्मचर्य: व्रत के दौरान ब्रह्मचर्य का पालन अनिवार्य माना गया है।दक्षिण दिशा: भगवान कार्तिकेय की पूजा करते समय अपना मुख दक्षिण दिशा (South) की ओर रखना विशेष फलदायी होता है क्योंकि वे दक्षिण दिशा के अधिपति माने जाते हैं।