क्यों फ्लॉप हुई सनी देओल की ‘बंटवारा 1947’? शबाना आजमी ने किया बड़ा खुलासा, बोलीं- ‘लोग बर्दाश्त नहीं कर पाए…’

भारतीय सिनेमा के इतिहास में विभाजन (Partition) और सामंती व्यवस्था की पृष्ठभूमि पर बनी कई फिल्मों ने दर्शकों के दिलों को छुआ, लेकिन कुछ फिल्में अपने दौर से बहुत आगे होने के कारण बॉक्स ऑफिस पर वह सफलता हासिल नहीं कर पाईं जिसकी वे हकदार थीं। जे.पी. दत्ता के निर्देशन में बनी मल्टी-स्टारर फिल्म 'बंटवारा' (Batwara 1947) भी ऐसी ही एक बहुचर्चित फिल्म रही है। इस फिल्म में सनी देओल, धर्मेंद्र, विनोद खन्ना, डिंपल कपाड़िया, अमृता सिंह और शबाना आजमी जैसे दिग्गज कलाकारों ने अभिनय किया था। हाल ही में एक पुराने दौर के सिनेमाई अनुभवों पर बात करते हुए दिग्गज अभिनेत्री शबाना आजमी (Shabana Azmi) ने इस बात का खुलासा किया कि आखिर इतनी बड़ी स्टारकास्ट और दमदार निर्देशन के बावजूद यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप क्यों साबित हुई थी।
'लोग उस कड़वे सच को बर्दाश्त नहीं कर पाए': शबाना आजमी का बेबाक विश्लेषण
शबाना आजमी ने फिल्म की असफलता का विश्लेषण करते हुए बताया कि 'बंटवारा' में राजस्थान के सामंती परिवेश, जातिगत भेदभाव, बंधुआ मजदूरी और डकैतों की जिंदगी की जिस नग्न और कठोर सच्चाई को दिखाया गया था, 80 के दशक के उत्तरार्ध का दर्शक वर्ग उसके लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं था। उन्होंने कहा, "जे.पी. दत्ता का सिनेमा बेहद रियलिस्टिक, रॉ और इंटेंस होता है। 'बंटवारा' में कोई बनावटी ड्रामा या कमर्शियल मसाला नहीं था। उसमें इंसानी लालच, हिंसा और व्यवस्था के अत्याचार का ऐसा कड़वा सच दिखाया गया था जिसे सिनेमाघरों में बैठकर देखना कई दर्शकों के लिए असहज और दर्दनाक था। दर्शक उस दौर में केवल मनोरंजन और नाच-गाने वाली फिल्में देखना पसंद करते थे, वे इस भारी मानसिक तनाव और यथार्थ को बर्दाश्त नहीं कर पाए।"
सनी देओल और धर्मेंद्र की जोड़ी: एक्शन की उम्मीद में आए दर्शकों को मिला गहरा ड्रामा
फिल्म के फ्लॉप होने का एक अन्य बड़ा कारण दर्शकों की उम्मीदों का मिसमैच होना भी था। उस दौर में धर्मेंद्र और सनी देओल दोनों ही एक्शन सिनेमा के बेताज बादशाह माने जाते थे। दर्शक जब इन दोनों सितारों को एक साथ स्क्रीन पर देखने थिएटर पहुंचे, तो उन्हें पारंपरिक 'मारधाड़ और बदले' वाली मसाला फिल्म की उम्मीद थी। हालांकि, फिल्म में सनी देओल का किरदार (विक्रम) और धर्मेंद्र का किरदार (सुमेर) व्यवस्था से प्रताड़ित होकर बागी बने ऐसे व्यक्तियों का था, जिनके जीवन में अवसाद, संघर्ष और अंततः दर्दनाक त्रासदी थी। पारंपरिक हीरोइज्म और सुखद अंत (Happy Ending) न होने के कारण यह फिल्म मुख्यधारा के आम मसाला दर्शकों को संतुष्ट नहीं कर सकी।
जे.पी. दत्ता का गंभीर निर्देशन और समाज की गहरी दरारों का चित्रण
फिल्म समीक्षकों का भी मानना है कि 'बंटवारा' तकनीक, संवाद और सिनेमैटोग्राफी के लिहाज से अपने समय की बेहतरीन फिल्मों में से एक थी। फिल्म में जागीरदारों द्वारा किसानों के शोषण, पुलिसिया क्रूरता और सामाजिक असमानता के मुद्दों को बड़ी संवेदनशीलता के साथ उठाया गया था। लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का संगीत और मजरूह सुल्तानपुरी के गीत भी बेहद उच्च स्तर के थे। बावजूद इसके, फिल्म की धीमी गति और भारी भरकम संवाद आम दर्शकों के गले से नीचे नहीं उतरे। यह फिल्म उस दौर के समाज का एक ऐसा आईना थी, जिसे लोग देखना नहीं चाहते थे।
कल्ट क्लासिक का दर्जा: टीवी और डिजिटल पर मिली जबरदस्त पहचान
भले ही 'बंटवारा' सिनेमाघरों में व्यावसायिक रूप से उम्मीद के मुताबिक कमाई न कर सकी हो, लेकिन समय बीतने के साथ इसे सिनेमा प्रेमियों और विश्लेषकों द्वारा एक 'कल्ट क्लासिक' (Cult Classic) का दर्जा दिया गया। जब यह फिल्म टेलीविजन और बाद में डिजिटल व ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर प्रसारित हुई, तो लोगों ने सनी देओल, विनोद खन्ना और शबाना आजमी के संजीदा अभिनय की जमकर तारीफ की। शबाना आजमी के अनुसार, कई फिल्में तात्कालिक बॉक्स ऑफिस आंकड़ों में भले ही मात खा जाती हैं, लेकिन उनका सिनेमाई मूल्य हमेशा जीवित रहता है और 'बंटवारा' भी उन्हीं गिनी-चुनी कालजयी फिल्मों में शामिल है।