जब जिद पर आ गईं माता पार्वती! तब सप्तऋषि समझाने नहीं… परीक्षा लेने पहुंचे थे, लेकिन किसके कहने पर? जानें शिव पुराण की कथा

सनातन धर्म के पौराणिक आख्यानों में भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह केवल दो दैवीय शक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि निष्ठा, त्याग और अटूट प्रेम की पराकाष्ठा का प्रमाण है। जब सती के भस्म होने के बाद माता पार्वती ने पर्वतराज हिमालय और मैना के घर पुनर्जन्म लिया, तो उन्होंने बाल्यावस्था से ही देवाधिदेव महादेव को अपने पति रूप में वरण करने का संकल्प ले लिया था। देवर्षि नारद के उपदेश के बाद उन्होंने शिव को पाने के लिए घोर और दुष्कर तपस्या का मार्ग चुना। माता की इस हठ और अडिग जिद के सामने जब संपूर्ण देवलोक चकित रह गया, तब सात परम पूज्य सप्तऋषि (Saptarishi) उनकी तपोस्थली पर पहुंचे। आम धारणा यह है कि ऋषिगण उन्हें समझाने और गृहस्थ जीवन की ओर लौटाने गए थे, लेकिन वास्तविकता यह थी कि वे माता के प्रेम और धैर्य की कठिनतम परीक्षा लेने पहुंचे थे। अब बड़ा प्रश्न यह उठता है कि सप्तऋषियों को यह परीक्षा लेने के लिए वास्तव में किसने भेजा था?
किसके आदेश पर सप्तऋषि पहुंचे थे माता पार्वती की तपोस्थली?
शिव पुराण की 'रुद्र संहिता' के पार्वती खंड में इस प्रसंग का अत्यंत सुंदर और सूक्ष्म वर्णन मिलता है। जब माता पार्वती की तपस्या अपने चरम पर पहुंची—जिसमें उन्होंने धूप, बारिश, ठंड को सहते हुए सूखे पत्ते तक खाना छोड़ दिया और 'अपर्णा' कहलाईं—तब उनके तपोबल से तीनों लोक तपने लगे।
माता की इस प्रचंड भक्ति से स्वयं भगवान शिव का वैराग्य भी पिघलने लगा था। हालांकि, महादेव यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि क्या पार्वती का यह अनुराग केवल बाह्य आकर्षण है या उनकी आत्मा शिवत्व में पूर्णतः समर्पित हो चुकी है। इसलिए स्वयं भगवान शिव के ही कहने पर (आदेश पर) सप्तऋषि माता पार्वती की तपोस्थली पर पहुंचे थे। भगवान भोलेनाथ ने सप्तऋषियों से कहा था कि वे जाकर पार्वती के मन की थाह लें, उनके संकल्प की परीक्षा करें और देखें कि क्या उनका चित्त किसी प्रलोभन या भय से डिग सकता है।
सप्तऋषियों ने कैसे ली माता पार्वती की कठिन परीक्षा?
भगवान शिव की आज्ञा पाकर सप्तऋषि (मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और वसिष्ठ) हिमालय के उस निर्जन वन में पहुंचे जहां माता तपस्यारत थीं। ऋषियों ने अत्यंत मधुर और ज्ञानी वचनों के साथ संवाद शुरू किया, लेकिन उनका उद्देश्य पार्वती के निश्चय को हिलाना था।
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भगवान शिव के स्वरूप की आलोचना: ऋषियों ने जानबूझकर शिव के वैरागी और अवधूत स्वरूप का अत्यंत भयानक और विचित्र चित्र खींचा। उन्होंने कहा, "हे राजकुमारी! तुम राजा हिमालय की सुकुमारी पुत्री हो। तुम्हारे लिए शिव योग्य वर कैसे हो सकते हैं? उनके पास न कोई सुंदर घर है, न वस्त्र। वे श्मशान में निवास करते हैं, भस्म रमाते हैं, गले में विषैले सर्प धारण करते हैं और भूतों-प्रेतों की बारात साथ लेकर चलते हैं।"
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वैकुंठपति श्रीहरि का प्रस्ताव: ऋषियों ने पार्वती जी को सांसारिक और दैवीय ऐश्वर्य का प्रलोभन देते हुए कहा कि यदि तुम्हें विवाह ही करना है, तो समस्त ऐश्वर्य, सौंदर्य और सुखों के स्वामी भगवान श्रीहरि विष्णु का वरण करो, जो वैकुंठ के अधिपति हैं और पीतांबर धारण करते हैं। एक दिगंबर और अघोरी के पीछे अपनी अनमोल युवावस्था को क्यों नष्ट कर रही हो?
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नारद जी के उपदेश को बताया भ्रम: ऋषियों ने यह तक कह दिया कि नारद मुनि की बातों में आकर तुमने यह अनर्थकारी मार्ग चुन लिया है। नारद का तो काम ही लोगों को भटकाना और वैरागी बनाना है, इसलिए उनकी सलाह छोड़कर अपने माता-पिता के महल लौट जाओ।
माता पार्वती का वह अमर उत्तर, जिसने ऋषियों को भी नतमस्तक कर दिया
सप्तऋषियों की इन तीखी और विचलित करने वाली बातों को सुनकर माता पार्वती तनिक भी क्रोधित या भ्रमित नहीं हुईं। उन्होंने अत्यंत शांत और गंभीर वाणी में ऐसा उत्तर दिया जो युगों-युगों के लिए अमर हो गया।
माता पार्वती ने हाथ जोड़कर कहा, "हे मुनिवरों! आपका ज्ञान और नीति अपनी जगह उचित हो सकती है, परंतु मेरा संकल्प सूर्य के प्रकाश की तरह अटल है। जिस प्रकार सोना अग्नि में तपकर और अधिक निखरता है, उसी प्रकार आपके वचनों ने मेरे शिव-प्रेम को और अधिक दृढ़ कर दिया है। शिव चाहे गुणहीन हों या सगुण, रूपवान हों या विरूप, दिगंबर हों या सर्वेश्वर—मेरे मन और प्राण केवल उन्हीं को समर्पित हो चुके हैं।"
माता ने आगे स्पष्ट शब्दों में अपनी अटूट प्रतिज्ञा दोहराते हुए कहा:
"जन्म कोटि लगि रगर हमारी। बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी॥"
अर्थात्, चाहे करोड़ों जन्म क्यों न लेने पड़ें, मेरी यही जिद और हठ रहेगी कि या तो शंभु (शिव) का ही वरण करूंगी, अन्यथा आजीवन कुंवारी रहूंगी; चाहे स्वयं ब्रह्मा और विष्णु भी आकर मुझे प्रस्ताव दें, मेरा मन शिव के अतिरिक्त किसी अन्य की कल्पना भी नहीं कर सकता।
परीक्षा में उत्तीर्ण हुईं माता, महादेव ने साक्षात दिया दर्शन
माता पार्वती की इस निष्कलंक और अगाध भक्ति को देखकर सप्तऋषि भाव-विभोर हो गए। उन्होंने मन ही मन जान लिया कि यह कोई साधारण मानवी नहीं, बल्कि साक्षात जगदंबा और पराशक्ति हैं। ऋषियों ने उनके चरणों में मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और कहा कि वे केवल महादेव के निर्देश पर उनकी निष्ठा की परीक्षा लेने आए थे, और इस परीक्षा में वे पूर्णतः उत्तीर्ण हुई हैं।
इसके बाद सप्तऋषियों ने कैलाश लौटकर भगवान शिव को माता के त्याग और अडिग संकल्प का पूरा वृत्तांत सुनाया। ऋषियों की बात सुनकर भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हुए। तत्पश्चात महादेव ने स्वयं एक वृद्ध बटुक (ब्राह्मण) का रूप धरकर अंतिम बार माता की परीक्षा ली और अंततः अपने वास्तविक चतुर्भुज दिव्य रूप में प्रकट होकर माता पार्वती को अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार करने का वरदान दिया।