‘पिघल रहा है यूरोप’: सिर्फ जर्मनी में गर्मी से 5,000 से ज्यादा मौतें; WHO की रिपोर्ट में दुनिया भर के आंकड़े बेहद डरावने

ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन (Climate Change) का सबसे खतरनाक और वीभत्स रूप इस समय उस यूरोप में देखने को मिल रहा है, जो अपनी ठंडी वादियों, बर्फ से ढके पहाड़ों और सुहावने मौसम के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। यूरोप के 23 देशों में इस समय रिकॉर्ड-तोड़ हीटवेव (भीषण लू) चल रही है, जिसके कारण वहां का जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो चुका है।
हालत यह है कि भीषण गर्मी के कारण डामर की सड़कें पिघल रही हैं, रेलवे ट्रैक टेढ़े हो रहे हैं और शहरों की ट्रैफिक लाइट तक पिघलकर लटक गई हैं। विभिन्न अंतरराष्ट्रीय अनुमानों के मुताबिक, इस साल यूरोप में अब तक 20,000 से ज्यादा लोगों की जान सिर्फ गर्मी के कारण जा चुकी है। इसमें सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा जर्मनी का है, जहां पिछले 6 महीनों में ही 5 हजार से अधिक लोगों की मौत हीटवेव से हुई है।
यूरोप के किस देश में कितनी पड़ रही है गर्मी?
'द अर्थ.कॉम' ($TheEarth.com$) की एक रिपोर्ट के अनुसार, यूरोप के कई देशों में पारा 40 से 44 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच चुका है, जो वहां के इतिहास में अभूतपूर्व है:
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फ्रांस: राजधानी पेरिस में पारा 40°C को पार कर गया है, जबकि फ्रांस का पीसोस (Pisos) शहर 44.3°C तापमान के साथ इस समय पूरे यूरोप का सबसे गर्म शहर बन चुका है।
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जर्मनी: जर्मनी के कोचेम (Cochem) में 8 जुलाई को सर्वकालिक उच्च 41.7°C तापमान दर्ज किया गया।
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पोलैंड: पोलैंड में गर्मी ने 105 साल का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। यहाँ के स्लुबिस शहर में तापमान 40.5°C रिकॉर्ड हुआ।
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स्पेन और अन्य देश: स्पेन के बिलबाओ में पारा 42°C के पार है, डेनमार्क के ओडिन्से में 36.6°C और अमूमन ठंडे रहने वाले ब्रिटेन (UK) में भी तापमान 36.1°C तक पहुंच गया है।
जर्मनी में क्यों हुई इतनी मौतें? रॉबर्ट कोच इंस्टीट्यूट का खुलासा
रॉयटर्स (Reuters) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, जर्मनी में इस साल अब तक गर्मी से संबंधित 5,120 मौतें दर्ज की जा चुकी हैं। इनमें से अधिकांश मौतें जून के आखिरी हफ्ते में हुईं, जब साप्ताहिक औसत तापमान सामान्य से काफी ज्यादा था।
जर्मनी के नेशनल पब्लिक हेल्थ इंस्टीट्यूट, रॉबर्ट कोच इंस्टीट्यूट (RKI) ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि मरने वालों में सबसे ज्यादा संख्या बुजुर्गों और महिलाओं की थी। कुल मौतों में से लगभग 4,270 लोग 75 वर्ष या उससे अधिक उम्र के थे। वैज्ञानिकों का कहना है कि यूरोप के लोग सदियों से अत्यधिक ठंड में रहने के आदी हैं, इसलिए उनका शरीर लगातार 40 से 45°C की इस भीषण गर्मी और हीटस्ट्रोक को सहन नहीं कर पा रहा है।
WHO की रिपोर्ट: दुनिया भर में हर साल करीब 5 लाख मौतें
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा 28 अप्रैल 2026 को प्रकाशित की गई नई 'क्लाइमेट रिपोर्ट' के वैश्विक आंकड़े रोंगटे खड़े करने वाले हैं:
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सालाना मौतें: साल 2000 से 2019 के बीच दुनिया भर में हर साल औसतन 4 लाख 89 हजार (4.89 लाख) लोग सिर्फ अत्यधिक गर्मी और लू लगने (Heatstroke) के कारण अपनी जान गंवाते हैं।
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65+ उम्र के लोगों पर खतरा: साल 2000-2004 और 2017-2021 के बीच के डेटा की तुलना करें तो बुजुर्गों (65 साल से अधिक) में गर्मी के कारण मरने की दर में 85% का भयानक इजाफा हुआ है।
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महाद्वीपों का हाल: दुनिया भर में गर्मी से होने वाली कुल मौतों का 45% हिस्सा अकेले एशिया में और 36% हिस्सा यूरोप में दर्ज किया जाता है। इससे पहले साल 2022 में भी यूरोप में गर्मी ने 61,672 लोगों की जान ली थी।
अर्थव्यवस्था को 11 लाख करोड़ का झटका और भीषण जल संकट
एलियांज रिसर्च ($Allianz\ Research$) के आर्थिक मॉडल के आधार पर किए गए कैलकुलेशन के मुताबिक, यह भीषण हीटवेव सिर्फ इंसानी जान ही नहीं ले रही, बल्कि यूरोपीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ भी तोड़ रही है।
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जीडीपी (GDP) पर असर: इस साल की गर्मी से यूरोपीय देशों को 11 लाख करोड़ रुपये तक का तात्कालिक आर्थिक नुकसान हो सकता है। वहीं, साल 2030 तक यह आंकड़ा बढ़कर 61 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने की आशंका है।
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जल संकट का खतरा: यूरोपीय पर्यावरण एजेंसी का अनुमान है कि बढ़ती गर्मी और सूखते जलस्रोतों के कारण अगले साल तक यूरोप की करीब 34% आबादी भीषण जल संकट (Water Scarcity) की चपेट में आ जाएगी।
यूरोप के इस बदतर हालात से भारत के लिए क्या है सीख?
यूरोप की यह मौजूदा स्थिति भारत के लिए एक बहुत बड़ी और गंभीर चेतावनी है। भारत पहले से ही दुनिया के सबसे गर्म और घनी आबादी वाले देशों में से एक है। यूरोप के इस संकट से भारत को निम्नलिखित रणनीतिक सीख लेनी होगी:
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व्यापक 'हीट एक्शन प्लान' ($Heat\ Action\ Plan$): वर्तमान में भारत के केवल कुछ चुनिंदा शहरों (जैसे अहमदाबाद) में ही व्यवस्थित हीट एक्शन प्लान लागू है। अब समय आ गया है कि देश के हर राज्य और जिले में इसे अनिवार्य किया जाए।
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अर्बन इंफ्रास्ट्रक्चर में बदलाव: शहरों में कंक्रीट के जंगलों के कारण बनने वाले 'हीट आइलैंड' को रोकने के लिए कूल रूफ्स (Cool Roofs) तकनीक और गर्मी को सोखने वाले 'हीट-रेजिलिएंट' मकानों के निर्माण को कानूनी रूप से बढ़ावा देना होगा।
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इमरजेंसी मेडिकल तैयारी: हर जिले में अत्यधिक गर्मी के महीनों के दौरान आपातकालीन कूलिंग सेंटर, ओआरएस (ORS) काउंटर और अस्पतालों में हीटस्ट्रोक से निपटने के लिए विशेष वार्ड्स की एडवांस व्यवस्था करनी होगी, ताकि समय रहते नागरिकों की जान बचाई जा सके।