सितंबर की बारिश लेगी महंगाई की असली परीक्षा: मॉनसून कमजोर रहने और अल-नीनो के असर से FY27 में CPI Inflation 5.5% पार जाने का बड़ा खतरा

भारतीय अर्थव्यवस्था में खाद्य वस्तुओं की कीमतों और आम आदमी के घरेलू बजट की स्थिरता के लिए सितंबर का महीना निर्णायक साबित होने जा रहा है। यूनियन बैंक ऑफ इंडिया और प्रमुख आर्थिक शोध संस्थानों की ताजा रिपोर्टों में चेतावनी दी गई है कि यदि दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के अंतिम चरण यानी सितंबर में बारिश कमजोर रहती है और अल-नीनो (El Niño) के हालात मजबूत होते हैं, तो चालू वित्त वर्ष 2026-27 (FY27) में देश की उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित खुदरा महंगाई 5.5 प्रतिशत या उससे अधिक के स्तर तक पहुंच सकती है। यद्यपि खरीफ फसलों की बुवाई में सुधार दर्ज किया गया है, लेकिन फसल की परिपक्वता, उपज और आगामी रबी सीजन के लिए सितंबर की बारिश का सामान्य रहना बेहद अनिवार्य माना जा रहा है।
मॉनसून का मौजूदा घाटा और क्षेत्रीय विषमताएं
अगस्त के अंतिम सप्ताह तक के आंकड़ों के अनुसार, देश भर में दक्षिण-पश्चिम मॉनसून का कुल स्तर लंबी अवधि के औसत (LPA) से लगभग 13 प्रतिशत नीचे बना हुआ है। यद्यपि मध्य भारत में स्थिति स्थिर है, लेकिन प्रमुख कृषि राज्यों में क्षेत्रीय घाटा चिंता का विषय बना हुआ है। उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों में लगभग 10 प्रतिशत और दक्षिणी राज्यों में 22 प्रतिशत तक बारिश की कमी दर्ज की गई है। वहीं, पूर्वी और उत्तर-पूर्वी हिस्सों में यह घाटा 27 प्रतिशत से अधिक है। आंध्र प्रदेश और बिहार जैसे प्रमुख उत्पादक राज्यों में 40 से 42 प्रतिशत तक कम बारिश दर्ज की गई है, जिससे धान, दलहन और तिलहन की पैदावार पर सीधा असर पड़ने का जोखिम गहरा गया है।
जलाशयों का जलस्तर और रबी सीजन की चुनौतियां
केंद्रीय जल आयोग (CWC) द्वारा मॉनिटर किए जाने वाले 176 प्रमुख जलाशयों में कुल भंडारण क्षमता का लगभग 64 प्रतिशत पानी मौजूद है, जो तात्कालिक राहत तो देता है लेकिन पिछले वर्ष के इसी समय के मुकाबले लगभग 18 प्रतिशत कम है। यदि सितंबर में अच्छी मानसूनी बारिश नहीं होती है, तो जलाशयों का बैकअप सीमित रह जाएगा। इसका सीधा नकारात्मक असर मिट्टी की नमी (Soil Moisture) और आगामी रबी फसलों—विशेष रूप से गेहूं, चना और सरसों की बुवाई व सिंचाई पर पड़ेगा। पोस्ट-हार्वेस्ट (कटाई के बाद) अवधि में उत्पादन में कमी सीधे तौर पर मंडियों में खाद्य वस्तुओं की आवक को घटा सकती है।
खाद्य महंगाई का सीपीआई बास्केट पर सीधा दबाव
भारत के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) में खाद्य एवं पेय पदार्थों की हिस्सेदारी लगभग 46 प्रतिशत के करीब है। जब भी प्रतिकूल मौसम, अनियमित बारिश या सूखे जैसी स्थिति बनती है, तो दालों, खाद्य तेलों, सब्जियों और अनाजों की कीमतें तेजी से उछलती हैं। विश्लेषकों का मानना है कि यदि मॉनसून का यह घाटा 10 प्रतिशत से अधिक पर टिका रहता है, तो खाद्य मुद्रास्फीति में 250 से 300 आधार अंकों की अतिरिक्त वृद्धि हो सकती है, जो सीधे तौर पर हेडलाइन सीपीआई को 5.5 प्रतिशत के पार धकेल देगी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें 90 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बने रहने की स्थिति में इनपुट लागत और ट्रांसपोर्टेशन खर्च भी महंगाई को हवा दे सकते हैं।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था और उपभोक्ता मांग पर गहराता असर
कमजोर मॉनसून और ऊंची खाद्य महंगाई का दोहरा प्रभाव ग्रामीण भारत की क्रय शक्ति पर पड़ता है। भारतीय ग्रामीण परिवारों के कुल बजट का एक बड़ा हिस्सा भोजन पर खर्च होता है। फसलों की कम पैदावार से एक तरफ किसानों की वास्तविक आय सीमित हो सकती है, वहीं दूसरी तरफ आवश्यक वस्तुओं की महंगाई ग्रामीण मांग (Rural Consumption) को घटा सकती है। इसका सीधा असर ट्रैक्टर बुकिंग, टू-व्हीलर बिक्री, दैनिक उपभोग की वस्तुओं (FMCG) और त्योहारी सीजन के दौरान होने वाले रिटेल कारोबार पर पड़ सकता है।
आरबीआई की मौद्रिक नीति: क्या ब्याज दरों में कटौती की उम्मीदों पर फिरेगा पानी?
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने अपनी मौद्रिक नीति के तहत वित्त वर्ष 2027 के लिए खुदरा महंगाई का बेसलाइन अनुमान 5.0 प्रतिशत तय किया हुआ है। केंद्रीय बैंक 4 प्रतिशत के महंगाई लक्ष्य को साधने के लिए लंबे समय से सतर्क रुख अपनाए हुए है। यदि सितंबर में कमजोर बारिश के चलते खुदरा महंगाई 5.5 प्रतिशत या उससे ऊपर निकलती है, तो आरबीआई के लिए ब्याज दरों में कटौती करने की गुंजाइश पूरी तरह समाप्त हो जाएगी। लंबे समय तक उच्च खाद्य महंगाई बने रहने की सूरत में वित्त वर्ष के अंत तक दरों में यथास्थिति बनाए रखने या जरूरत पड़ने पर नीतिगत दरों को सख्त करने का दबाव भी बढ़ सकता है।