Income Tax Planning 2026: न्यू टैक्स रिजीम में भी ₹13.5 लाख तक की सैलरी होगी टैक्स फ्री; नौकरीपेशा लोगों के लिए जादुई विकल्प बना ‘Corporate NPS’

वित्त वर्ष 2026-27 में देश के नौकरीपेशा लोगों के बीच न्यू टैक्स रिजीम (New Tax Regime) अपनाने वालों की संख्या लगातार तेजी से बढ़ रही है। इसका मुख्य कारण इसका बेहद आसान होना और कम टैक्स दरें हैं। हालांकि, इस नए टैक्स सिस्टम की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इसमें पुराने टैक्स सिस्टम (Old Tax Regime) की तरह होम लोन ब्याज (80C), मेडिकल इंश्योरेंस (80D) या एलआईसी जैसी ज्यादातर पारंपरिक छूट और कटौतियां (Deductions) नहीं मिलती हैं।
इसके बावजूद, सैलरीड क्लास (Salaried Employees) के लिए नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) के तहत 'कॉरपोरेट एनपीएस' एक ऐसा इकलौता और बेहद असरदार हथियार है, जो न केवल आपका भारी-भरकम टैक्स बचाता है, बल्कि आपके रिटायरमेंट के लिए एक सुरक्षित और बड़ा फंड (Retirement Corpus) भी तैयार करता है। आइए समझते हैं कि न्यू टैक्स रिजीम में आप इस सरकारी स्कीम के जरिए अपनी 13.5 लाख रुपये तक की सालाना कमाई को पूरी तरह टैक्स फ्री कैसे बना सकते हैं।
सेक्शन 80CCD(2): न्यू टैक्स रिजीम का सबसे बड़ा सीक्रेट
न्यू टैक्स रिजीम में निवेश पर टैक्स छूट के रास्ते भले ही सीमित हों, लेकिन इनकम टैक्स एक्ट के सेक्शन 80CCD(2) के तहत मिलने वाला टैक्स बेनिफिट आज भी पूरी तरह जारी है। इस नियम का गणित बहुत सीधा और फायदेमंद है:
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कंपनी का योगदान: इस नियम के तहत आपकी एम्प्लॉयर (कंपनी) आपके कॉर्पोरेट एनपीएस (Corporate NPS) अकाउंट में आपकी बेसिक सैलरी (Basic Salary) और महंगाई भत्ते (DA) का अधिकतम 14% तक योगदान (Contribution) कर सकती है।
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टैक्सेबल इनकम में कटौती: कंपनी द्वारा आपके एनपीएस खाते में जमा की गई यह 14 फीसदी की पूरी रकम आपकी कुल टैक्सेबल इनकम (Taxable Income) से सीधे घटा दी जाती है। यानी इस रकम पर आपको ₹1 का भी टैक्स नहीं देना होता।
₹12 लाख की टैक्स-फ्री सीमा ऐसे पहुंचेगी ₹13.5 लाख के पार
आइए इसे एक बेहद आसान वित्तीय उदाहरण से समझते हैं:
यदि किसी कर्मचारी की सालाना बेसिक सैलरी और डीए (DA) मिलाकर 10 लाख रुपये है, तो कॉरपोरेट एनपीएस के तहत उसकी कंपनी उसके एनपीएस खाते में सालाना 1.40 लाख रुपये (10 लाख का 14%) तक जमा कर सकती है। यह ₹1.40 लाख पूरी तरह टैक्स डिडक्शन के दायरे में आएगा।
टैक्स सेविंग का गणित: न्यू टैक्स रिजीम में विभिन्न स्टैंडर्ड डिडक्शंस और रिबेट्स को मिलाकर जो टैक्स-फ्री लिमिट प्रभावी रूप से ₹12 लाख तक बैठती थी, वह इस कॉरपोरेट एनपीएस के जुड़ते ही सीधे ₹13.5 लाख (₹13,40,000) से अधिक के स्तर पर पहुंच जाती है। सबसे खास बात यह है कि सेक्शन 80CCD(2) के तहत मिलने वाली इस टैक्स कटौती की कोई अलग ऊपरी सीमा (Upper Limit) तय नहीं है, यह पूरी तरह आपकी बेसिक सैलरी के अनुपात पर तय होती है।
जितनी ज्यादा बेसिक सैलरी, उतना बड़ा टैक्स रिफंड
यह योजना हाई-सैलरी ब्रैकेट वाले कर्मचारियों के लिए टैक्स प्लानिंग का सबसे उत्तम जरिया है। आपकी बेसिक सैलरी + DA का स्तर जितना ऊंचा होगा, टैक्स छूट का दायरा भी उसी रफ्तार से बढ़ेगा:
| कर्मचारी की बेसिक सैलरी + DA (सालाना) | कंपनी का अधिकतम NPS योगदान (14% टैक्स छूट) |
| ₹8 लाख | ₹1.12 लाख |
| ₹10 लाख | ₹1.40 लाख |
| ₹12 लाख | ₹1.68 लाख |
| ₹15 लाख | ₹2.10 लाख |
| ₹20 लाख | ₹2.80 लाख |
यानी ऊंचे वेतन वाले कर्मचारियों को टैक्स में सीधे लाखों रुपये बचाने के साथ-साथ बुढ़ापे के लिए एक बड़ा फंड इकट्ठा करने का दोहरा फायदा मिलता है।
पेरोल में लागू करना बेहद आसान, रजिस्ट्रेशन भी हुआ डिजिटल
इतने शानदार और कानूनी टैक्स बेनेफिट्स होने के बावजूद भारत में कई कंपनियां अभी तक कॉरपोरेट एनपीएस को अपने सैलरी स्ट्रक्चर (CTC) में पूरी तरह शामिल नहीं कर पाई हैं। टेक और टैक्स एक्सपर्ट्स के मुताबिक इसके पीछे एकमात्र वजह सही जानकारी की कमी (Lack of Awareness) है।
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लागू करना खेल है: कई एचआर (HR) और कंपनियों को लगता है कि एनपीएस को पेरोल में जोड़ना एक जटिल प्रक्रिया है, जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं है। आजकल के लगभग सभी आधुनिक HRMS और ऑटोमेटेड पेरोल सिस्टम पहले से ही एनपीएस योगदान और फ्लेक्सिबल बेनिफिट स्ट्रक्चर (FBC) को सपोर्ट करते हैं। इसकी पूरी प्रक्रिया हूबहू प्रोविडेंट फंड (PF) काटने जैसी ही सरल है।
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डिजिटल ऑनबोर्डिंग: कंपनियां पॉइंट्स ऑफ प्रेजेंस (POP) और सेंट्रल रिकॉर्डकीपिंग एजेंसी (CRA) की मदद से बेहद आसानी से इस कूटनीति से जुड़ सकती हैं। अब एनपीएस में कर्मचारियों का रजिस्ट्रेशन पूरी तरह पेपरलेस और डिजिटल हो चुका है, जिससे ऑनबोर्डिंग की प्रक्रिया महज कुछ सेकंड्स में पूरी हो जाती है।