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युवा भारत के सामने बेरोज़गारी का बड़ा संकट: क्या ‘जनसांख्यिकीय लाभांश’ बन रहा है देश की सबसे गंभीर चुनौती?

भारत आज दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती और चमकती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है. वैश्विक मंच पर देश की सबसे बड़ी यूएसपी (USP) इसकी विशाल युवा आबादी है, जिसे अर्थशास्त्र की भाषा में "जनसांख्यिकीय लाभांश" (Demographic Dividend) कहा जाता है. माना जाता है कि यदि इन करोड़ों युवाओं के हाथों को पर्याप्त और सही रोजगार के अवसर मिलें, तो वे भारत को आर्थिक और सामाजिक रूप से एक महाशक्ति बना सकते हैं. लेकिन इसी सुनहरे सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि लगातार बढ़ती बेरोज़गारी आज देश के सामने सबसे गंभीर और सुलगती चुनौतियों में से एक बन चुकी है. यह केवल एक सामान्य आर्थिक समस्या नहीं है, बल्कि इसका सीधा और गहरा असर देश की सामाजिक शांति, विकास की रफ्तार और राष्ट्रीय स्थिरता पर पड़ रहा है.

सामाजिक शांति पर पहला वार: युवाओं में बढ़ता असंतोष और निराशा

बेरोज़गारी का सबसे पहला और जानलेवा प्रभाव हमारे समाज के ताने-बाने पर पड़ता है. किसी भी इंसान के लिए रोजगार केवल पैसा कमाने का जरिया नहीं होता, बल्कि यह उसे समाज में एक सम्मान, आत्मविश्वास और जीने का एक मकसद देता है. जब लाखों डिग्रीधारी, शिक्षित और योग्य युवा लंबे समय तक नौकरी के लिए भटकते हैं और उन्हें निराशा हाथ लगती है, तो उनके भीतर भयंकर असंतोष और हताशा घर कर जाती है.

आर्थिक तंगी के कारण परिवारों के भीतर रोज-रोज का कलेश और दबाव बढ़ता है. यही परिस्थितियाँ आगे चलकर सामाजिक तनाव, अवसाद, नशाखोरी और यहाँ तक कि अपराध की वारदातों को जन्म देती हैं. हालांकि बेरोज़गारी सीधे किसी दंगे या संघर्ष की वजह नहीं बनती, लेकिन यह समाज में एक ऐसा बारूद जरूर तैयार कर देती है, जहाँ मामूली चिंगारी भी बड़ी अशांति फैला सकती है.

प्रतिभा की बर्बादी से थमती है आर्थिक रफ्तार, उद्योगों पर पड़ता है सीधा असर

बढ़ती बेरोज़गारी देश की इकोनॉमी के पहिये को भी धीमा कर देती है. किसी भी राष्ट्र की असली प्रगति इस बात पर टिकी होती है कि वह अपने मानव संसाधन (Human Resource) का कितना सही इस्तेमाल कर रहा है. जब देश के पढ़े-लिखे, इंजीनियर, डॉक्टर, मैनेजमेंट ग्रेजुएट और कुशल युवा खाली बैठते हैं, तो देश की एक बहुत बड़ी बौद्धिक और श्रम प्रतिभा पूरी तरह बर्बाद हो जाती है.

इससे देश की कुल उत्पादन क्षमता (Production Capacity) घटती है, लोगों की जेब में पैसा न होने से मार्केट में क्रय शक्ति (Purchasing Power) कम हो जाती है, जिससे उद्योगों की बिक्री और वृद्धि बुरी तरह प्रभावित होती है. जब बाजार में मंदी आती है, तो सरकार को मिलने वाले टैक्स (कर राजस्व) में भी भारी कमी आती है, जिसके चलते विकास की गति सुस्त पड़ जाती है और नए रोजगार पैदा करना और भी मुश्किल चक्रव्यूह बन जाता है.

शिक्षा और उद्योगों में तालमेल की कमी: हर साल कॉलेजों से निकल रहे लाखों बेरोजगार

भारत में डिग्री और असल नौकरी (Skills vs Degree) के बीच बढ़ता अंतर आज सबसे बड़ी चिंता का विषय है. हर साल देश के स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों से लाखों छात्र डिग्रियां लेकर पास आउट होते हैं, लेकिन उनमें से एक बहुत बड़े हिस्से को अपनी योग्यता के मुताबिक काम नहीं मिलता.

इसका सबसे प्रमुख कारण यह है कि हमारी पुरानी शिक्षा प्रणाली और आज के आधुनिक उद्योगों की बदलती आवश्यकताओं के बीच कोई तालमेल ही नहीं है. आज का दौर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), डिजिटल इकोनॉमी और ऑटोमेशन (स्वचालन) का है, जहाँ रटी-रटाई थ्योरी काम नहीं आती. इस दौर में युवाओं को कौशल आधारित शिक्षा (Skill-based Education), व्यावसायिक प्रशिक्षण, कोडिंग, डिजिटल स्किल्स और खुद का स्टार्टअप शुरू करने के लिए उद्यमिता (Entrepreneurship) को बढ़ावा देना अब विकल्प नहीं, बल्कि सबसे बड़ी जरूरत बन गया है.

गांवों से शहरों की ओर पलायन: अनौपचारिक क्षेत्र और झुग्गी-झोपड़ियों का विस्तार

ग्रामीण भारत में बेरोज़गारी की स्थिति और भी ज्यादा गंभीर और चिंताजनक है. देश के ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले अधिकांश परिवार आज भी पारंपरिक खेती पर निर्भर हैं, जहाँ रोजगार पूरी तरह से मौसमी (Seasonal Unemployment) और मौसम की मर्जी पर निर्भर होता है. गांवों में बड़े उद्योगों, मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स और नए विकल्पों की भारी कमी के कारण हर साल लाखों लोग अपना घर-बार छोड़कर शहरों की ओर पलायन (Migration) करने को मजबूर होते हैं.

इस अंधाधुंध पलायन की वजह से दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु जैसे बड़े महानगरों पर जनसंख्या का दबाव खतरनाक स्तर पर पहुंच जाता है. शहरों में बुनियादी सुविधाओं (पानी, बिजली, सीवरेज) पर बोझ बढ़ता है, झुग्गी-झोपड़ियों का तेजी से विस्तार होता है और अनौपचारिक क्षेत्र (Informative Sector) में बेहद कम वेतन पर असुरक्षित और कठिन माहौल में काम करने की मजबूरी पैदा होती है.

राष्ट्रीय स्थिरता की पहली शर्त है समान अवसर और आर्थिक सुरक्षा

किसी भी लोकतांत्रिक देश की आंतरिक सुरक्षा और स्थिरता इस बात पर निर्भर करती है कि उसके नागरिकों को समान अवसर और सम्मानजनक जीवन मिल रहा है या नहीं. यदि देश का युवा वर्ग खुद को विकास की मुख्यधारा से कटा हुआ महसूस करने लगे, तो सिस्टम और सरकारी संस्थाओं के प्रति उसका भरोसा टूटने लगता है. इसलिए बड़े पैमाने पर रोजगार का सृजन करना सिर्फ एक आर्थिक एजेंडा नहीं है, बल्कि यह देश की अखंडता, राष्ट्रीय एकता और सामाजिक स्थिरता को बनाए रखने की सबसे पहली और अनिवार्य शर्त है.

इस महा-संकट से निपटने के लिए सरकार, प्राइवेट सेक्टर और शैक्षणिक संस्थानों को एक टेबल पर आना होगा. मैन्युफैक्चरिंग, कृषि आधारित उद्योगों, टूरिज्म, हेल्थकेयर, ग्रीन एनर्जी और एमएसएमई (MSMEs) जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों को बढ़ावा देकर ही करोड़ों रोजगार एक साथ पैदा किए जा सकते हैं. भारत की युवा शक्ति देश की सबसे बड़ी पूंजी है, और यदि इस असीमित ऊर्जा को सही दिशा, स्किल और सही समय पर काम मिल जाए, तो भारत को दुनिया की नंबर-1 आर्थिक महाशक्ति बनने से कोई नहीं रोक सकता.

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