अगस्त में झमाझम बारिश के बाद भी नहीं मिटा मॉनसून घाटा: अल नीनो के असर से कई राज्यों में सूखे जैसे हालात, खरीफ फसलों पर गहराया संकट

दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के दूसरे चरण में अगस्त के दौरान देश के कई हिस्सों में बादलों ने जोरदार उपस्थिति दर्ज कराई। मध्य भारत और पहाड़ी राज्यों में नदियां उफान पर आ गईं और कई क्षेत्रों में बाढ़ जैसी स्थिति देखने को मिली। हालांकि, इस तेज बारिश के बावजूद देश के कुल मानसूनी बारिश का क्षेत्रीय घाटा पूरी तरह समाप्त नहीं हो पाया है। मौसम वैज्ञानिकों और कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, इस साल बारिश का वितरण अत्यधिक असमान रहा है। कुछ सीमित इलाकों में बादल फटने और अतिवृष्टि (Extreme Rainfall) जैसी घटनाएं दर्ज हुईं, जबकि देश के कई विशाल कृषि क्षेत्र अब भी सामान्य से कम बारिश की मार झेल रहे हैं। अल्पकालिक मूसलाधार बारिश से पानी बहकर निकल गया, जिससे भूजल और मिट्टी की नमी को आवश्यक स्तर तक रिचार्ज होने का पर्याप्त समय नहीं मिल सका।
अल नीनो का दोहरा प्रभाव: इन प्रमुख राज्यों में बने सूखे जैसे गंभीर हालात
प्रशांत महासागर में सक्रिय अल नीनो (El Niño) मौसमी परिघटना और हिंद महासागर द्विध्रुव (IOD) की बदलती परिस्थितियों ने भारतीय उपमहाद्वीप में मानसूनी हवाओं के प्रवाह को असंतुलित कर दिया है। इसके चलते देश के कई बड़े खाद्यान्न उत्पादक राज्यों में सूखे जैसे गंभीर हालात पैदा हो गए हैं। पूर्वी और उत्तर-पूर्वी राज्यों के अलावा दक्षिणी प्रायद्वीप के कई हिस्से भारी बारिश की कमी का सामना कर रहे हैं। बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, पूर्वी उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और आंतरिक तमिलनाडु के कई जिलों में संचयी वर्षा सामान्य से 25 से 40 प्रतिशत तक कम दर्ज की गई है। खेतों में पर्याप्त पानी न होने और नहरों के टेल तक जल आपूर्ति न पहुंचने से किसानों को अपनी खड़ी फसलों को बचाने के लिए महंगे डीजल पंपों और ट्यूबवेलों पर निर्भर होना पड़ रहा है।
खरीफ फसलों पर मंडराया संकट: धान, दलहन और तिलहन की पैदावार को झटका
मॉनसून के इस असंतुलन का सबसे सीधा और घातक प्रभाव देश की खरीफ फसलों पर पड़ रहा है। अगस्त का महीना फसलों की वानस्पतिक वृद्धि और दाना बनने की प्रक्रिया के लिए सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। पूर्वी राज्यों में पानी की कमी के कारण धान (Paddy) की रोपाई पिछड़ गई है और कई जगहों पर रोपी गई फसलें सूखने की कगार पर पहुंच गई हैं। दूसरी ओर, दलहन फसलों—विशेष रूप से अरहर (तुअर), उड़द और मूंग के प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में सूखे की स्थिति से पैदावार में भारी गिरावट की आशंका जताई जा रही है। सोयाबीन और मूंगफली जैसी तिलहन फसलों पर भी नमी की कमी और कीटों के प्रकोप का दोहरा संकट मंडरा रहा है। कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि फसलों को तुरंत आवश्यक नमी नहीं मिली, तो प्रति हेक्टेयर उत्पादन में 15 से 20 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है।
जलाशयों का गिरता जलस्तर और आगामी रबी सीजन की नई चुनौतियां
देश भर के प्रमुख बांधों और जलाशयों में पानी का भंडारण भी चिंता का एक बड़ा कारण बना हुआ है। केंद्रीय जल आयोग (CWC) की निगरानी वाले प्रमुख जलाशयों में पानी का कुल स्तर पिछले वर्षों के इसी समय के औसत से काफी नीचे चल रहा है। दक्षिणी और पूर्वी भारत के बांधों में जलस्तर की स्थिति सबसे अधिक नाजुक है। जलाशयों में पर्याप्त पानी न होने से न केवल वर्तमान में सिंचाई और पनबिजली उत्पादन प्रभावित हो रहा है, बल्कि आगामी रबी सीजन की बुवाई पर भी इसका प्रतिकूल असर पड़ना तय है। रबी की मुख्य फसलों जैसे गेहूं, चना, सरसों और रबी मक्के की बुवाई के लिए जमीन में जिस प्राथमिक नमी और शुरुआती सिंचाई की आवश्यकता होती है, उसका संकट गहरा सकता है।
किसानों की आर्थिक स्थिति पर मार और खाद्य महंगाई भड़कने का अंदेशा
फसलों की विफलता और कम पैदावार का सीधा प्रभाव देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और आम नागरिक के घरेलू बजट पर पड़ना तय माना जा रहा है। किसानों की उत्पादन लागत बढ़ चुकी है क्योंकि उन्हें अतिरिक्त सिंचाई, कीटनाशकों और दोबारा बुवाई पर भारी रकम खर्च करनी पड़ी है। यदि खरीफ उत्पादन में कमी आती है, तो इसका सीधा असर खुले बाजार में कृषि जिंसों की कीमतों पर दिखेगा। चावल, दालों और खाद्य तेलों के दाम बढ़ने से देश में खाद्य मुद्रास्फीति (Food Inflation) में अचानक उछाल आ सकता है। यह स्थिति न केवल ग्रामीण भारत की क्रय शक्ति और मांग को प्रभावित करेगी, बल्कि केंद्र सरकार और नीति निर्माताओं के लिए भी बफर स्टॉक और खाद्यान्न प्रबंधन की नई मुश्किलें खड़ी करेगी।
मौसम विभाग का पूर्वानुमान: क्या सितंबर की बारिश कर पाएगी भरपाई?
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, मॉनसून के अंतिम चरण यानी सितंबर के दौरान बंगाल की खाड़ी में बनने वाले कम दबाव के क्षेत्रों (Low Pressure Systems) पर सबकी निगाहें टिकी हैं। यदि सितंबर में मानसूनी ट्रफ सामान्य स्थिति में लौटती है और सक्रिय पश्चिमी विक्षोभों के साथ मिलकर वर्षा के नए दौर की शुरुआत होती है, तो कुछ हद तक मिट्टी की नमी में सुधार हो सकता है। हालांकि, मौसम विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि सितंबर की बारिश अब पिछड़ चुकी और सूख चुकी फसलों को पूरी तरह पुनर्जीवित नहीं कर पाएगी, लेकिन यह आगामी रबी फसलों की तैयारी और भूजल स्तर को स्थिर रखने में मददगार साबित हो सकती है। कृषि विभाग ने प्रभावित राज्यों में आकस्मिक फसल योजना (Contingency Crop Plan) लागू करने और किसानों को कम अवधि व कम पानी वाली वैकल्पिक फसलों को अपनाने की सलाह दी है।