IIT Kanpur: आईआईटी कानपुर के इस प्रोफेसर को मिली नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज की फेलोशिप; 01 जनवरी से होगी शुरुआत

देश के अग्रणी तकनीकी एवं अनुसंधान संस्थानों में शुमार भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कानपुर (IIT Kanpur) के खाते में एक और राष्ट्रीय उपलब्धि जुड़ गई है। संस्थान के प्रख्यात प्राध्यापक एवं वैज्ञानिक को विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उत्कृष्ट और निरंतर अनुसंधान योगदान के लिए 'नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज, इंडिया' (NASI) की प्रतिष्ठित फेलोशिप के लिए चुना गया है। देश की सबसे पुरानी विज्ञान अकादमियों में से एक नासी द्वारा दी जाने वाली यह फेलोशिप 01 जनवरी से औपचारिक रूप से प्रभावी होगी। यह सम्मान न केवल संबंधित वैज्ञानिक के वर्षों के गहन अकादमिक शोध का प्रमाण है, बल्कि इससे आईआईटी कानपुर के उच्च-स्तरीय वैज्ञानिक अनुसंधान इकोसिस्टम को भी राष्ट्रीय मंच पर नई पहचान मिली है।
क्या है नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज (NASI) फेलोशिप और इसका महत्व?
नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज, इंडिया (NASI) की स्थापना वर्ष 1930 में भारत में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, शोध और अनुसंधानों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से की गई थी। इसके संस्थापक सदस्यों में भारत के महान वैज्ञानिक प्रो. मेघनाद साहा जैसे दिग्गज शामिल रहे हैं।
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चयन का कठोर पैमाना: नासी की फेलोशिप देश के केवल उन्हीं चुनिंदा वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और प्राध्यापकों को प्रदान की जाती है, जिन्होंने मौलिक शोध (Fundamental Research), तकनीकी नवाचार और व्यावहारिक विज्ञान के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रभाव छोड़ा हो।
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पीयर-रिव्यू प्रक्रिया: इस फेलोशिप के लिए नामांकन के बाद देश के वरिष्ठ वैज्ञानिकों की विशेष समिति कई चरणों में शोध पत्रों के साइटेशन, पेटेंट और व्यावहारिक उपयोगिता का गहन मूल्यांकन करती है।
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01 जनवरी से प्रभावी कार्यकाल: औपचारिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद चुने गए फेलो का कार्यकाल आने वाले वर्ष की पहली तारीख यानी 01 जनवरी से शुरू होता है, जिसके तहत उन्हें राष्ट्रीय विज्ञान नीतियों, सलाहकार परिषदों और एकेडमी के प्रमुख अनुसंधान सम्मेलनों में भागीदारी का अवसर मिलता है।
आईआईटी कानपुर के वैज्ञानिक अनुसंधान को मिला बड़ा प्रोत्साहन
आईआईटी कानपुर हमेशा से एयरोस्पेस इंजीनियरिंग, केमिकल साइंसेज, मैटेरियल इंजीनियरिंग, नैनोटेक्नोलॉजी और कंप्यूटर साइंस जैसे क्षेत्रों में अत्याधुनिक शोध का वैश्विक केंद्र रहा है। संस्थान के फैकल्टी सदस्य को नासी फेलोशिप मिलना इस बात का परिचायक है कि संस्थान में चल रहे लैब-टू-मार्केट और गहरे मौलिक शोध समाज और राष्ट्र की वैज्ञानिक प्राथमिकताओं के अनुकूल हैं। संस्थान के निदेशक और वरिष्ठ प्राध्यापकों ने इस उपलब्धि पर हर्ष व्यक्त करते हुए इसे युवा शोधार्थियों और पीएचडी छात्रों के लिए एक बड़ी प्रेरणा बताया है।
युवा शोधार्थियों के लिए कैसे मददगार बनेगी यह फेलोशिप?
अकादमी का फेलो बनने के बाद शोधकर्ता को राष्ट्रीय स्तर पर अन्य अग्रणी शोध प्रयोगशालाओं, सीएसआईआर (CSIR) संस्थानों और अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालयों के साथ अंतर-विषयक (Interdisciplinary) परियोजनाओं पर काम करने के व्यापक मंच मिलते हैं।
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रिसर्च फंडिंग और कोलाबरेशन: इससे संस्थान के संबंधित विभाग को उन्नत शोध परियोजनाओं के लिए अतिरिक्त केंद्र प्रायोजित अनुदान और बहु-संस्थागत सहयोग प्राप्त करने में मदद मिलती है।
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उच्च स्तरीय मेंटरशिप: प्रयोगशाला में कार्यरत एमटेक और पीएचडी छात्रों को देश के शीर्ष वैज्ञानिक थिंक टैंक के साथ जुड़ने और अपने शोध निष्कर्षों को उच्च प्रभाव वाले वैज्ञानिक जर्नल्स में प्रकाशित कराने का सीधा मार्गदर्शन मिलता है।
विज्ञान और अनुसंधान के क्षेत्र में निरंतर उत्कृष्ट योगदान देने वाले शिक्षाविदों को मिलने वाले ऐसे राष्ट्रीय सम्मान भारत को वैश्विक ज्ञान अर्थव्यवस्था (Knowledge Economy) के रूप में स्थापित करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होते हैं।