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SIP और म्यूचुअल फंड में नहीं बन रहा मुनाफा? जानिए निवेश का यह सुपरहिट विकल्प, जहां बिना रिस्क मिलेगा पक्का रिटर्न

पिछले कुछ समय से घरेलू और वैश्विक शेयर बाजार में लगातार उठापटक देखने को मिल रही है। ऐसे माहौल में जिन खुदरा निवेशकों ने सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान यानी एसआईपी (SIP) के जरिए इक्विटी म्यूचुअल फंड में बड़ी उम्मीदों के साथ पैसा लगाया था, उनका रिटर्न सुस्त या कई मामलों में सपाट नजर आ रहा है। उत्तर प्रदेश, दिल्ली-एनसीआर, बिहार, महाराष्ट्र और राजस्थान सहित देश के तमाम प्रमुख शहरों के आम नौकरीपेशा और मध्यवर्गीय निवेशक यह सोचकर उलझन में हैं कि क्या उन्हें अपनी चलती हुई एसआईपी जारी रखनी चाहिए या फिर अपनी गाढ़ी कमाई को किसी ऐसे वित्तीय विकल्प में शिफ्ट कर देना चाहिए जहां पूंजी की पूरी गारंटी हो और रिटर्न भी बिना किसी झटके के तय समय पर मिले।

जब इक्विटी बाजार एक सीमित दायरे में फंस जाता है, तो म्यूचुअल फंड पोर्टफोलियो में वैसी चमक नहीं दिखती जैसी तेजी के दौर में नजर आती है। ऐसे में वित्तीय सलाहकार और मार्केट एक्सपर्ट्स पोर्टफोलियो को पूरी तरह इक्विटी के भरोसे छोड़ने के बजाय डेट और फिक्स्ड इनकम सिक्योरिटीज की तरफ डायवर्सिफाई करने की सलाह दे रहे हैं।

क्या है टार्गेट मैच्योरिटी फंड्स और हाई यील्ड बॉन्ड्स का पूरा गणित

अगर आप म्यूचुअल फंड के उतार-चढ़ाव से मानसिक तनाव में हैं, तो फिक्स्ड इनकम स्पेस में इस समय सबसे तेजी से उभरता हुआ विकल्प टार्गेट मैच्योरिटी फंड्स (Target Maturity Funds – TMFs) और सॉवरेन/पीएसयू बॉन्ड्स हैं। यह विकल्प उन निवेशकों के लिए सबसे मुफीद साबित हो रहा है जो शेयर बाजार के जोखिम से कोसों दूर रहकर एक तय समय सीमा में निश्चित लाभ कमाना चाहते हैं।

टार्गेट मैच्योरिटी फंड्स दरअसल पैसिव डेट म्यूचुअल फंड होते हैं। इनकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इनकी एक तय मैच्योरिटी तारीख होती है, जैसे 3 साल, 5 साल या 8 साल। ये फंड आपका पैसा किसी प्राइवेट कंपनी के रिस्की शेयरों में नहीं लगाते, बल्कि केंद्र सरकार की प्रतिभूतियों (Government Securities या G-Secs), राज्य सरकारों के स्टेट डेवलपमेंट लोन्स (SDLs) और देश की नवरत्न या महारत्न सरकारी कंपनियों द्वारा जारी किए गए एएए-रेटेड (AAA Rated PSU Bonds) बॉन्ड में निवेश करते हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि इनमें डिफॉल्ट का खतरा न के बराबर यानी शून्य के करीब होता है।

यील्ड टू मैच्योरिटी यानी पहले दिन ही लॉक हो जाता है आपका तय मुनाफा

टार्गेट मैच्योरिटी फंड्स और सरकारी बॉन्ड्स की सबसे बड़ी ताकत है इनकी यील्ड टू मैच्योरिटी (YTM)। जब कोई निवेशक इनमें पैसा लगाता है, तो उसी दिन यह साफ हो जाता है कि यदि वह मैच्योरिटी तक टिका रहेगा, तो उसे कितना सालाना रिटर्न मिलेगा। वर्तमान ब्याज दर चक्र में ये फंड्स लगभग 7.20 प्रतिशत से लेकर 7.75 प्रतिशत तक का सालाना इंडिकेटिव यील्ड ऑफर कर रहे हैं।

इक्विटी म्यूचुअल फंड की तरह इनमें हर दिन एनएवी (NAV) गिरने का खौफ नहीं सताता। यदि निवेशक फंड की परिपक्वता अवधि तक अपना निवेश बनाए रखता है, तो बीच के समय में बाजार में ब्याज दरें बढ़ें या घटें, निवेशक को मैच्योरिटी पर तय किया गया मुनाफा हर हाल में मिलता है। यह उन लोगों के लिए बेहतरीन विकल्प है जिन्हें बच्चों की पढ़ाई, शादी या रिटायरमेंट के लिए अगले 3 से 5 साल बाद एक निश्चित फंड की जरूरत है।

क्या मौजूदा एसआईपी को तुरंत बंद कर देना सही फैसला है

अक्सर नए और अनुभवहीन निवेशक तब सबसे बड़ी भूल कर बैठते हैं जब वे बाजार गिरते ही अपनी एसआईपी को बंद कर देते हैं या घाटे में म्यूचुअल फंड यूनिट्स बेचकर बाहर निकल जाते हैं। वित्तीय अनुशासन का बुनियादी नियम कहता है कि जब शेयर बाजार नीचे होता है, तब आपकी एसआईपी उसी मासिक किस्त में म्यूचुअल फंड की अधिक यूनिट्स खरीदती है। इसे रूपी कॉस्ट एवरेजिंग (Rupee Cost Averaging) कहा जाता है।

जब बाजार दोबारा तेजी पकड़ेगा, तो यही सस्ती खरीदी गई यूनिट्स आपके पोर्टफोलियो को भारी कंपाउंडिंग रिटर्न देंगी। इसलिए पूरी इक्विटी एसआईपी बंद करने के बजाय अपने पोर्टफोलियो को रीबैलेंस करना सबसे सही रणनीति मानी जाती है। इसके लिए आप 60:40 का एसेट एलोकेशन फॉर्मूला अपना सकते हैं, जिसमें 60 प्रतिशत हिस्सा ग्रोथ के लिए इक्विटी एसआईपी में जारी रखें और 40 प्रतिशत हिस्सा स्थिरता और सुरक्षा के लिए टार्गेट मैच्योरिटी फंड्स, आरबीआई फ्लोटिंग रेट बॉन्ड्स या हाई-यील्ड बैंक एफडी में पार्क कर दें।

लिक्विडिटी, टैक्स नियम और किन निवेशकों के लिए है यह सबसे मुफीद

टार्गेट मैच्योरिटी फंड्स की एक और शानदार खूबी इनकी लिक्विडिटी यानी पैसे की तरलता है। पारंपरिक फिक्स्ड डिपॉजिट में अगर आप समय से पहले पैसा निकालते हैं, तो बैंक आपसे पेनल्टी वसूलते हैं। इसके विपरीत, टार्गेट मैच्योरिटी फंड्स ओपन-एंडेड होते हैं, जिसका अर्थ है कि आपातकाल की स्थिति में आप कभी भी अपनी यूनिट्स को भुनाकर पैसा अपने बैंक खाते में वापस पा सकते हैं।

टैक्सेशन के नजरिए से देखा जाए तो 1 अप्रैल 2023 के बाद से डेट म्यूचुअल फंड्स से होने वाले लाभ पर निवेशक के संबंधित इनकम टैक्स स्लैब के अनुसार टैक्स लगता है। इसके बावजूद, उच्च सुरक्षा, तय अवधि में सॉवरेन गारंटी वाले एसेट्स में निवेश और बिना किसी क्रेडिट रिस्क के नियमित रिटर्न देने के कारण यह विकल्प उन रूढ़िवादी निवेशकों के लिए सबसे मुफीद है जो अपनी मूल पूंजी पर एक पैसे का भी जोखिम नहीं उठाना चाहते और फिक्स्ड डिपॉजिट से बेहतर या उसके समानांतर पारदर्शी माध्यम की तलाश में हैं।

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