चीन-रूस के प्रभाव पर लगाम! 18वें BRICS समिट में भारत ने मनवाया अपनी कूटनीति का लोहा; रिपोर्ट में हुआ बड़ा खुलासा

नई दिल्ली में संपन्न हुए 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन (18th BRICS Summit 2026) के बाद वैश्विक भू-राजनीतिक विश्लेषकों और थिंक टैंक रिपोर्ट्स में भारत के कूटनीतिक प्रभाव की गूंज सुनाई दे रही है। हालिया अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों और कूटनीतिक समीक्षाओं में यह बड़ा दावा किया गया है कि सम्मेलन के दौरान भारत ने ब्रिक्स मंच को चीन और रूस का 'पश्चिम-विरोधी हथियार' बनने से सफलतापूर्वक रोक दिया। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मौजूदगी के बावजूद भारत अपनी संतुलित विदेश नीति और रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) को केंद्र में बनाए रखने में पूरी तरह सफल रहा। इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई दिल्ली की एक असाधारण और ऐतिहासिक कूटनीतिक जीत के रूप में देखा जा रहा है।
ब्रिक्स को पश्चिम-विरोधी गुट बनने से कैसे रोका?
ब्रिक्स समूह के विस्तार के बाद यह आशंका जताई जा रही थी कि बीजिंग और मॉस्को इस मंच का इस्तेमाल पश्चिमी देशों और जी7 (G7) के खिलाफ एक आक्रामक राजनीतिक मोर्चा खड़ा करने के लिए करेंगे। हालांकि, शिखर सम्मेलन के पहले ही दिन सर्वसम्मति से अपनाए गए 'नई दिल्ली घोषणापत्र 2026' (New Delhi Declaration) ने इस विमर्श को पूरी तरह बदल दिया:
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गुटनिरपेक्षता और संतुलन: भारत ने स्पष्ट किया कि ब्रिक्स को दुनिया को दो विरोधी खेमों में बांटने का साधन नहीं बनना चाहिए। भारत ने पश्चिमी देशों के साथ अपने आर्थिक व सुरक्षा संबंधों की रक्षा करते हुए संगठन को स्वतंत्र वैश्विक आर्थिक सुधारों की दिशा में मोड़ा।
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डॉलर के बहिष्कार पर व्यावहारिक रुख: चीन और रूस जहां अमेरिकी डॉलर के पूर्ण बहिष्कार और एक त्वरित वैकल्पिक मुद्रा के दबाव में थे, वहीं भारत ने 'विकल्प तैयार करने' और स्थानीय मुद्राओं में द्विपक्षीय व्यापार बढ़ाने की व्यावहारिक नीति पर जोर दिया, जिससे वैश्विक वित्तीय स्थिरता पर कोई विपरीत असर न पड़े।
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वैश्विक व्यवस्था को नष्ट नहीं, समावेशी बनाने का संदेश: भारत के रुख के कारण घोषणापत्र में मौजूदा विश्व व्यवस्था के खिलाफ युद्ध छेड़ने के बजाय उसमें बहुपक्षीय सुधारों (Multilateral Reforms) और निष्पक्ष प्रतिनिधित्व की मांग को प्रमुखता दी गई।
ग्लोबल साउथ के हितों और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सुधारों पर भारत की विजय
इस शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट संदेश दिया कि उभरती अर्थव्यवस्थाओं और 'ग्लोबल साउथ' (Global South) को केवल वैश्विक नियमों का पालन करने वाला (Rule-takers) नहीं, बल्कि वैश्विक नियम बनाने वाला (Rule-shapers) बनना होगा।
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सुरक्षा परिषद सुधार पर समर्थन: नई दिल्ली घोषणापत्र में चीन और रूस—जो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के स्थायी सदस्य हैं—ने संयुक्त राष्ट्र और सुरक्षा परिषद में भारत व ब्राजील की बड़ी भूमिका का औपचारिक रूप से दोबारा समर्थन किया।
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मानव-केंद्रित विकास को प्राथमिकता: भारत ने रक्षा या भू-राजनीतिक गठजोड़ के बजाय खाद्य सुरक्षा, नवाचार, आपूर्ति श्रृंखला की मजबूती और मानवीय विकास को एजेंडे के शीर्ष पर रखा।
मध्य पूर्व विवाद और खाड़ी देशों के बीच सहमति बनाने में निभाई मध्यस्थ भूमिका
सम्मेलन के दौरान मध्य पूर्व (पश्चिम एशिया) में जारी सैन्य संघर्ष और तनाव पर आम सहमति बनाना बेहद चुनौतीपूर्ण था। ब्रिक्स के नए सदस्यों—ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE)—के बीच क्षेत्रीय मतभेदों के बावजूद भारत ने अपने तटस्थ संबंधों का लाभ उठाते हुए घोषणापत्र में 'अधिकतम संयम' और लाल सागर में अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा का साझा संकल्प शामिल कराया।
चीनी राष्ट्रपति के दौरे के बीच सीमा पर शांति और द्विपक्षीय संतुलन
वर्ष 2019 के बाद चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की पहली भारत यात्रा के दौरान भी भारत ने अपनी संप्रभुता और सामरिक हितों से कोई समझौता नहीं किया। दोनों नेताओं के बीच हुई द्विपक्षीय वार्ता में भारत ने स्पष्ट किया कि वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर शांति और स्थिरता ही सामान्य संबंधों की पहली पूर्व शर्त है। भारत के इस दृढ़ रुख के चलते चीन को व्यापारिक और क्षेत्रीय मुद्दों पर 'आपसी सम्मान और आपसी संवेदनशीलता' के आधार पर आगे बढ़ने पर सहमति जतानी पड़ी।
वैश्विक थिंक टैंकों का मानना है कि 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भारत ने यह साबित कर दिया है कि 21वीं सदी की कूटनीति किसी एक गुट का अंधानुकरण करने में नहीं, बल्कि दुनिया के अलग-अलग शक्ति केंद्रों के बीच सेतु बनकर अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखने में निहित है।