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Monsoon June Pause: जून में ही मानसून की रफ्तार पर अचानक लगा ब्रेक, सैटेलाइट तस्वीरों ने बढ़ाई वैज्ञानिकों की चिंता; 65% तक कम हुई बारिश

जून की शुरुआत में रिकॉर्ड तोड़ रफ्तार से आगे बढ़ रहे दक्षिण-पश्चिम मानसून की स्पीड में अचानक बड़ा ब्रेक लगता नजर आ रहा है। कुछ दिनों पहले तक जो मानसून अपनी सामान्य तारीखों से काफी आगे चल रहा था, अब उसकी चाल देश के मध्य और पश्चिमी हिस्सों में आकर पूरी तरह ठप हो गई है। मौसम वैज्ञानिकों के लिए इस समय सबसे बड़ी चिंता का विषय भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) और वैश्विक मौसम एजेंसियों की ताजा सैटेलाइट तस्वीरें बनी हुई हैं, जिन्होंने मानसून के थमने के कड़वे सच को उजागर कर दिया है।

सैटेलाइट तस्वीरों ने क्यों बढ़ाई मौसम वैज्ञानिकों की चिंता?

यूरोपीय मौसम उपग्रह Meteosat, अमेरिकी मौसम एजेंसी NOAA और इसरो के INSAT-3DS सैटेलाइट से प्राप्त ताजा तस्वीरों ने एक बेहद डरावनी और चिंताजनक तस्वीर पेश की है। आमतौर पर जून के मध्य तक भारत के जिन हिस्सों में घने और गहरे मानसूनी बादलों की मोटी पट्टियां होनी चाहिए थीं, अंतरिक्ष से देखने पर वहां आसमान पूरी तरह साफ नजर आ रहा है। मध्य, पश्चिमी और प्रायद्वीपीय भारत के विशाल भूभाग पर मानसूनी बादलों की यह भारी कमी इस बात का सबसे बड़ा और पुख्ता सबूत है कि मानसून की प्रगति में एक बड़ा 'पॉज' आ गया है।

जमीन पर दिखने लगा खतरनाक असर, मध्य भारत में 65% बारिश की कमी

मानसून की इस अचानक आई सुस्ती का सीधा और नुकसानदेह असर अब देश की जमीन पर साफ दिखने लगा है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, 4 जून से 16 जून के बीच मध्य भारत में सामान्य से 65 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है। इस भारी गिरावट के चलते मध्य भारत इस समय पूरे देश का सबसे प्रभावित मौसम क्षेत्र बन गया है। महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और उनके आसपास के कई प्रमुख कृषि प्रधान जिलों में खरीफ फसलों की बुवाई के लिए यह समय बेहद महत्वपूर्ण होता है, लेकिन इस दौरान वहां नाममात्र की भी मानसूनी बारिश नहीं हुई है जिससे किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच गई हैं।

धमाकेदार शुरुआत के बाद सोलापुर में क्यों अटक गया मानसून?

इस साल मानसून की एंट्री बेहद शानदार और उम्मीदों से भरी रही थी। दक्षिण-पश्चिम मानसून अपनी सामान्य तारीख (1 जून) से तीन दिन बाद यानी 4 जून 2026 को केरल के तट पर पहुंचा था, लेकिन इसके तुरंत बाद इसने बेहद आक्रामक रफ्तार पकड़ी थी। जून के दूसरे हफ्ते तक मानसून ने केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, गोवा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, बिहार और पूरे पूर्वोत्तर भारत को अपनी आगोश में ले लिया था। यहां तक कि महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में भी इसकी समय से पहले एंट्री हो गई थी।

लेकिन इस तूफानी रफ्तार के बाद मानसून अचानक ठिठक गया। महाराष्ट्र के सोलापुर क्षेत्र में आकर मानसून पिछले एक हफ्ते से अधिक समय से एक ही जगह पर अटका हुआ है। विदर्भ में आमतौर पर मानसून 15 जून तक दस्तक दे देता है, लेकिन वहां के किसान अब भी आसमान की तरफ टकटकी लगाए बैठे हैं। इस सुस्ती के कारण उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों में अब मानसून अपनी सामान्य तारीख से 5 से 10 दिन की देरी से पहुंचने की आशंका है। उदाहरण के लिए, नवाबों के शहर लखनऊ में जहां मानसून हर साल 23 जून तक आ जाता था, अब वहां इसके जून के अंत या जुलाई के पहले हफ्ते में दस्तक देने की संभावना जताई जा रही है।

अचानक क्यों लगी मानसून की स्पीड पर ब्रेक? ये हैं 3 बड़े कारण

मौसम वैज्ञानिकों ने मानसून की रफ्तार अचानक थमने और बादलों के गायब होने के पीछे मुख्य रूप से तीन बड़े कारणों को जिम्मेदार ठहराया है:

  • लो-प्रेशर सिस्टम का गायब होना: जून के महीने में मानसून को आगे धकेलने के लिए बंगाल की खाड़ी में मजबूत कम दबाव के क्षेत्र (Low Pressure Zone) बनते हैं। ये सिस्टम एक शक्तिशाली इंजन की तरह काम करते हुए समुद्री नमी को देश के अंदरूनी हिस्सों तक खींचते हैं। इस साल जून में ऐसे सिस्टम बंगाल की खाड़ी से पूरी तरह गायब हैं।

  • कमजोर मानसून ट्रफ: उत्तर और मध्य भारत में व्यापक बारिश कराने वाली 'मानसून ट्रफ' (कम दबाव वाली बेल्ट) इस समय बेहद कमजोर स्थिति में आ गई है, जिससे हवाओं का दबाव नहीं बन पा रहा है।

  • पश्चिमी विक्षोभ का दखल: उत्तर भारत में अचानक सक्रिय हुए पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbance) ने भी मैदानी इलाकों में मानसूनी हवाओं के सामान्य प्रवाह और चक्र को बुरी तरह बाधित कर दिया है।

अल नीनो का साया और मंडराता खतरा

मौसम की इस बेरुखी के पीछे सबसे बड़ा वैश्विक और वैज्ञानिक कारण 'अल नीनो' (El Nino) को माना जा रहा है। आईएमडी (IMD) ने पहले ही इस बात की चेतावनी दी थी कि जून से सितंबर के इस पूरे मानसून सीजन के दौरान प्रशांत महासागर में मध्यम से मजबूत अल नीनो स्थितियां बनी रह सकती हैं। अल नीनो के एक्टिव होने वाले वर्षों में मानसूनी हवाओं का पूरा चक्र कमजोर हो जाता है, जिससे भारत में सामान्य से कम बारिश होती है। रही-सही कसर हिंद महासागर द्विध्रुव (IOD) ने पूरी कर दी है, जो इस समय पूरी तरह न्यूट्रल (तटस्थ) बना हुआ है, यानी यह अल नीनो के बुरे प्रभाव को कम करने में भारत की कोई मदद नहीं कर पा रहा है।

मानसून थमा है, तो कुछ इलाकों में बारिश क्यों हो रही है?

सैटेलाइट तस्वीरों में बादल गायब होने के बावजूद देश के कुछ हिस्सों में हो रही बारिश को लेकर आम लोगों में भ्रम की स्थिति है। इस पर वैज्ञानिकों ने साफ किया है कि जून में होने वाली हर बारिश मानसूनी नहीं होती। उदाहरण के लिए, नागपुर और विदर्भ के कुछ हिस्सों में हाल ही में हुई बारिश पूरी तरह से स्थापित मानसूनी हवाओं के कारण नहीं, बल्कि अत्यधिक गर्मी के कारण बने स्थानीय थंडरस्टॉर्म (गरज-चमक वाले बादलों) और क्षेत्रीय नमी के चलते हुई थी। वहीं, पूर्वोत्तर भारत और देश के पूर्वी हिस्सों में बंगाल की खाड़ी शाखा की नजदीकी के कारण स्थानीय स्तर पर भारी बारिश जारी है, जबकि देश का बाकी मुख्य हिस्सा सूखे का सामना कर रहा है।

क्या अभी से इस बात की चिंता करनी चाहिए?

मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि मानसून की प्रकृति कभी भी एक समान नहीं चलती। इसके चार महीनों के सफर में हमेशा सक्रिय (Active) और कमजोर (Break) चरण आते रहते हैं। इतिहास गवाह है कि पहले भी कई बार जून की कमी को जुलाई और अगस्त की भारी बारिश ने आसानी से पूरा किया है। हालांकि, इस बार कमजोर क्लाउड कवर, मध्य भारत में 65% कम बारिश और अल नीनो का एक साथ एक्टिव होना चिंता जरूर बढ़ाता है।

धान, सोयाबीन, कपास और दालों की खेती के लिए अगले दो हफ्ते देश के कृषि क्षेत्र के लिए बेहद क्रिटिकल (नाजुक) होने वाले हैं। अगर जून के अंत तक बंगाल की खाड़ी में कोई नया मौसमी सिस्टम बनता है और मानसून दोबारा सक्रिय होता है, तो किसानों का बड़ा नुकसान टाला जा सकता है। अन्यथा, अगर जुलाई में भी यह ड्राई स्पेल (सूखा दौर) खिंचा, तो जलाशयों के जल स्तर और देश की अर्थव्यवस्था पर बड़ा संकट खड़ा हो सकता है।

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