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एनसीईआरटी विवाद में नया मोड़ विवादास्पद चैप्टर लिखने वाले प्रोफेसर पहुंचे सुप्रीम कोर्ट, जस्टिस सूर्यकांत की बेंच के सामने लगाई गुहार

News India Live, Digital Desk: एनसीईआरटी (NCERT) की किताबों में बदलाव और ‘विवादास्पद’ सामग्री को लेकर चल रहा घमासान अब देश की सबसे बड़ी अदालत के दहलीज पर पहुंच गया है। जिन शिक्षाविदों और प्रोफेसरों ने उन अध्यायों को तैयार किया था, जिन पर अब कैंची चलाई गई है या जिन्हें विवादित बताया गया है, उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष दायर इस याचिका ने शिक्षा जगत और राजनीति में एक बार फिर नई बहस छेड़ दी है।विद्वानों की दलील: ‘हमारी बौद्धिक संपदा और साख का सवाल’सुप्रीम कोर्ट पहुंचे शिक्षाविदों का तर्क है कि किताबों से उनके लिखे गए अध्यायों को हटाना या उनमें मनमाना बदलाव करना उनकी बौद्धिक स्वतंत्रता का उल्लंघन है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि उन्होंने दशकों के शोध के बाद इन सामग्रियों को तैयार किया था। उनके मुताबिक, बिना उनकी सहमति के किताबों में किए गए बदलावों से न केवल अकादमिक स्तर पर गिरावट आएगी, बल्कि एक लेखक के तौर पर उनकी साख को भी नुकसान पहुँच रहा है। याचिका में मांग की गई है कि इस प्रक्रिया में पारदर्शिता बरती जाए।आखिर क्या है पूरा विवाद?बता दें कि पिछले कुछ समय से एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकों से कुछ खास ऐतिहासिक संदर्भों, राजनीतिक आंदोलनों और सामाजिक अध्यायों को हटाने या छोटा करने की प्रक्रिया चल रही है। सरकार और परिषद का तर्क है कि यह छात्रों पर बोझ कम करने (सिलेबस रेशनलाइजेशन) के लिए किया गया है। हालांकि, याचिकाकर्ता प्रोफेसरों का आरोप है कि यह बदलाव अकादमिक कारणों से कम और वैचारिक कारणों से ज्यादा प्रेरित हैं। अब जस्टिस सूर्यकांत की बेंच को यह तय करना है कि इस मामले में हस्तक्षेप की कितनी जरूरत है।जस्टिस सूर्यकांत की बेंच पर टिकीं निगाहेंकानूनी गलियारों में इस मामले को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह मामला सीधे तौर पर देश की शिक्षा नीति और विशेषज्ञों के अधिकारों से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट से आग्रह किया है कि उनके नाम उन किताबों से हटा दिए जाएं जिनमें उनकी मूल भावना के विपरीत बदलाव किए गए हैं। जस्टिस सूर्यकांत की पीठ इस मामले की सुनवाई के लिए तैयार हो गई है, जिससे अब यह साफ होगा कि भविष्य में स्कूली किताबों के कंटेंट पर किसका और कितना नियंत्रण होगा।अकादमिक जगत में मची हलचलसुप्रीम कोर्ट की इस शरण ने देश भर के इतिहासकारों और शिक्षाविदों को दो धड़ों में बांट दिया है। एक धड़ा इसे पाठ्यक्रम को आधुनिक बनाने की दिशा में जरूरी कदम मान रहा है, तो दूसरा इसे इतिहास के साथ छेड़छाड़ बता रहा है। बहरहाल, सर्वोच्च अदालत का फैसला यह तय करेगा कि क्या विशेषज्ञों के पास यह अधिकार सुरक्षित है कि उनके लिखे गए कंटेंट को सरकार किस हद तक संशोधित कर सकती है।

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