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20 जुलाई से संसद का मानसून सत्र, क्या फिर पेश होगा महिला आरक्षण और परिसीमन बिल

देश की राजनीति और विधायी कामकाज के लिहाज से एक बेहद बड़ी खबर सामने आ रही है। संसद का आगामी मानसून सत्र 20 जुलाई से शुरू होने जा रहा है। इस सत्र के दौरान देश के कई महत्वपूर्ण नीतिगत फैसलों और लंबित विधेयकों पर चर्चा होने की पूरी उम्मीद है। राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा सबसे तेज है कि क्या सरकार इस बार महिला आरक्षण (Women Reservation Bill) और परिसीमन बिल (Delimitation Bill) को दोबारा सदन के पटल पर पेश कर सकती है। सत्र को शांतिपूर्ण और सुचारू रूप से चलाने के लिए सरकार ने 19 जुलाई को एक महत्वपूर्ण सर्वदलीय बैठक (All-Party Meeting) भी आमंत्रित की है।

विधायी एजेंडे पर टिकीं सबकी नजरें और विपक्ष की रणनीति

संसद के इस मानसून सत्र के हंगामेदार होने के पूरे आसार जताए जा रहे हैं। विपक्षी दल जहां महंगाई, बेरोजगारी और हालिया भू-राजनीतिक घटनाक्रमों को लेकर सरकार को घेरने की तैयारी में हैं, वहीं सत्तापक्ष कई अहम विधेयकों को पारित कराने के इरादे से मैदान में उतरेगा। इस बार सबसे ज्यादा उत्सुकता महिला आरक्षण और लोकसभा व विधानसभा सीटों के नए सिरे से निर्धारण यानी परिसीमन बिल को लेकर बनी हुई है। यदि सरकार इन दोनों बिलों को आगे बढ़ाती है, तो देश के राजनीतिक ढांचे और आगामी चुनावों के समीकरणों में एक युगांतरकारी बदलाव देखने को मिल सकता है।

19 जुलाई की सर्वदलीय बैठक में बनेगा आम सहमति का फॉर्मूला

सत्र की शुरुआत से ठीक एक दिन पहले यानी 19 जुलाई को होने वाली सर्वदलीय बैठक को बेहद अहम माना जा रहा है। इस बैठक की अध्यक्षता संसदीय कार्य मंत्री करेंगे, जिसमें प्रधानमंत्री सहित सभी प्रमुख राजनीतिक दलों के फ्लोर लीडर्स शामिल होंगे। बैठक का मुख्य उद्देश्य सदन की कार्यवाही को बिना किसी गतिरोध के चलाना और महत्वपूर्ण विधेयकों पर विपक्ष के साथ आम सहमति बनाना है। सरकार की कोशिश होगी कि जनहित से जुड़े मुद्दों पर सार्थक बहस हो, जबकि विपक्ष भी अपने मुद्दों को प्राथमिकता से उठाने की मांग पर अड़ा रह सकता है।

देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर क्या होगा इस सत्र का असर

मानसून सत्र में होने वाले फैसले देश की लोकतांत्रिक और भौगोलिक व्यवस्था (Geographical Layout) पर गहरा असर डाल सकते हैं। महिला आरक्षण बिल लंबे समय से देश की आधी आबादी को राजनीति में उचित प्रतिनिधित्व देने का एक बड़ा माध्यम माना जा रहा है। वहीं, परिसीमन की प्रक्रिया से देश के विभिन्न राज्यों में संसदीय क्षेत्रों की सीमाओं और सीटों की संख्या में बदलाव आना तय है। यही वजह है कि उत्तर से लेकर दक्षिण भारत तक के सभी क्षेत्रीय दलों की निगाहें इस सत्र की हर एक हलचल पर टिकी हुई हैं।

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